सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे जब-जब सावन में गुजरता था तेरी आम की बगिया से होकर शरमाकर ढक लेती थी तू तब धानी चूनर से चेहरा सकुचाकर तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे पीली सरसों की पगडण्डी पर तेरा मटक-मटक कर चलना पानी का गागर उठाये इतराना फिर पीछे मुड़-मुड़ कर देखना तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे सखियों संग बैठ सावन के झूले में टुकुर-टुकुर कर मुझे निहारना फिर झटककर घने बालों को तेरा छुप-छुप कर Continue reading सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

बजरंगबली

बजरंगबली ये एक सच्चाई है जिसे मैंने कविता का रूप दिया है : आज भी बजरंगबली ,चहुँ ओर विधमान है l श्री राम के दूत है,हम कहते इन्हे हनुमान हैll रूप विशाल है ,सिर पर मुकुट विराजमान है l हाथ में गदा लिए, चमक लाली सामान है ll देते है दर्शन उन्हें, जिनका मन पवित्र है l करते जो निऱ्स्वार्थ सेवा उनके वो मित्र हैll स्वयं को नहीं मानते, ईश्वर का वो रूप l कहते है दूत हूँ उनका नहीं हूँ उनका रूपll मै अपने भक्तों को हर संकट से बचाता हूँ l करता हूँ उनकी रक्षा,रक्षक बन जाता हूँ Continue reading बजरंगबली

एक नई दोस्त 

एक नई दोस्त एक अजनबी चेहरे से आज हुई मुलाकात एक सूंदर उपवन में शायद एक नई दोस्त चेहरा अनजान ज़रूर था मगर दिल से मुलाकात जैसे सदियों पुरानी थी मासूम चेहरा, माथे पर गंभीर रेखाएँ, झील-सी गहरी नीली आंखें उत्सुकता से भरी थी गुलाबी होंठो पर एक अजीब चुप्पी शायद दिल की पीड़ा कहना चाहती हो मासूमियत उसके चेहरे पर जैसे बचपन झांक रहा हो जो उसकी उदासी बयां करती थी मगर दिल से बहुत चंचल, चपल, मधुर न जाने क्यों मुझे प्रतीत हुआ जैसे दिल में अनगिनित जख्म छिपाये हो रेशमी काले केश जिन्हें निशा प्रहरी बनकर सहला Continue reading एक नई दोस्त 

पापों की तिलांजलि

पापों की तिलांजलि जिंदगी की भाग दौड़ में कब भोर हुई, और कब सूरज ढल गया पता ही न चला कब रात का सन्नाटा पसरा, और कब सूर्योदय की अरुणिमा ने आंखें खोली मालूम न हुआ कब चाँद-सितारे चमके आकाश में, और कब सूरज की किरणों ने जगाया अलसाई कलियों को ज्ञात न हुआ कब काले मेघों ने बरसाए मोती धरा पर, और कब बसंत ने किया शृंगार सावन के झूलों संग मालूम न पड़ा कब बचपन बीता, और कब यौवन ने ली अंगड़ाई पता ही न चला बेचारी ज़िन्दगी उलझी रही क्रोध के अंगारो में लालच के शोलों में Continue reading पापों की तिलांजलि

निशिगंधा

निशिगंधा घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा? निस्तब्ध हो चली निशा, खामोश हुई दिशाएँ, अब सुनसान हो चली सब भरमाती राहें, बागों के भँवरे भी भरते नहीं अब आहें, महक उठी है,फिर क्युँ ये निशिगंधा? प्रतीक्षा किसकी सजधज कर करती वो वहाँ? मन कहता है जाकर देखूँ, महकी क्युँ ये निशिगंधा? घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा? है कोई चाँद खिला, या है वो कोई रजनीचर? या चातक है वो, या और कोई है सहचर! क्युँ निस्तब्ध निशा में खुश्बू बन रही वो बिखर! शायद ये हैं उसकी निमंत्रण के आस्वर! क्या प्रतीक्षा के ये पल Continue reading निशिगंधा

अभियंता – एक ब्रम्हपुरुष

अभियंता-एक ब्रम्ह पुरुष हे ब्रम्हा पुरुष अभियंता तूने जगत का उद्धार किया । महाकाल बनकर हर विनाश का प्रतिकार किया ।। तेरी परीकल्पना से भुत भविष्य सब निर्भर है । हे विश्वकर्मा के मानस अक्श तेरी सिंचन से जग निर्झर है ।। पत्थर तोड़ लोहा बनाते पारस बन कुंदन । खुशबु बन जग को महकाते घिसकर तुम चन्दन ।। माटी बन कुम्हार का तूने हर मूरत को गढ़ा है । शिलालेख पर आलेख बनकर पंचतत्व को पढ़ा है।। बनकर ऊर्जा पुंज तूने किया राष्ट्र का विकास । मंगल पर पद चिन्ह बनाया । पहुचकर दूर आकाश ।। कर्तव्यनिष्ठा पर संकल्पित Continue reading अभियंता – एक ब्रम्हपुरुष

तेरा पागल दीवाना

तेरा पागल दीवाना हवा के एक नटखट झोंके ने तेरे गालों को छूकर किया अपने प्यार का इजहार हवा का नटखट झोंका सहलाता रहा बार-बार तेरे कोमल गालों को और करता रहा इन्तजार कि तू सिर्फ एक बार अपनी नशीली आँखों से उस प्यासी कशिश के अनमोल क्षणों को उतार ले अपनी गर्म साँसों की गहराई में मगर डूबी हुई थी तू अपने ही ख्यालों में इतना कि हो न सका अहसास तुझे किसी के पागलपन का था दीवाना कितना वो तेरी रेशम सी मुलायम कपोलों का छूना चाहा जब-जब उसने तेरे नरम गालों को फिसल गए अरमान उसके बार-बार Continue reading तेरा पागल दीवाना

माँ न करना अब इंतज़ार मेरा (नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि )

माँ न करना अब इंतज़ार मेरा (नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि ) प्यारे दोस्तों, ये कविता स्वo नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित करता हूँ | प्रद्युमन रेयान पब्लिक स्कूल, गुरुग्राम (गुडगाँव) का वह छात्र है जो कुछ ही दिन पहले एक दरिंदे के हाथों हम सबको छोड़कर परियों के देश चला गया है| इश्वर उसकी अमर आत्मा को शांति दे| माँ मेरी कैसे मैं तुझे समझाऊँ क्या हुआ मुझे कैसे मैं बतलाऊँ पीड़ा अपनी मैं कैसे जतलाऊँ बिन तेरे माँ बहुत मैं घबराऊँ न करना अब इंतज़ार मेरा कभी न लौटेगा लाडला तेरा क्योंकि तू जान है Continue reading माँ न करना अब इंतज़ार मेरा (नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि )

मेरे शहर में

मेरे शहर में बेगुनाहों की लाशों पर, बेखौफ चलते हैं लोग यहाँ फिर क्यों रिश्तों को, बिलखते हैं लोग मेरे शहर में खबर है कि मेघा, खूब बरसे हैं इस बार सावन में फिर क्यों बूँद-बूँद को, तरसते हैं लोग मेरे शहर में हर गली सरकारी चर्चा है, कि भरे हैं भंडार अनाजों के फिर क्यों भूख से तड़पते हैं, मासूम बच्चे मेरे शहर में काली घटा छाई, तो मेघ गरजने लगे हैं आकाश में गरजते हैं तो फिर क्योँ बरसते हैं मेघ मेरे शहर में सूरज की रोशनी में, रात का ख़ौफ़नाक सन्नाटा देखा है मैंने फिर क्यों दिन Continue reading मेरे शहर में

वो जानवर है

वो जानवर है वो इंसान है शायद हमारी तरह नहीं दिखता उसकी सूरत नहीं मिलती हमसे कोई भी देख डर जाए उसे देखते शायद साँसे थम जाए अलबत्ता वो इंसान ही तो है हमारी तरह दोपाया ना सही चौपाया ही सही कई मायनों में हम इंसानों से बेहतर पेट की आग स्वाहा हो जाए बच्चे उसके भूखे ना सो जाए उसका भोर सूरज संग हो जाए उसका सांझ बीत जाए बस इतना ही तो उस इंसान को चाहिए। वो इंसान ही तो है या शायद नहीं क्योंकि वो हम इंसानों की तरह अपनों से छल नहीं करता ना वो किसी Continue reading वो जानवर है

मेरी प्यारी हिंदी

मेरी प्यारी हिंदी लिखने में हैं सबसे सरल दिखने में दुल्हन सी सुंदर माथे पर हैं प्यारी बिंदी सबकी सखी हैं मेरी हिंदी सबसे प्यारी मेरी हिंदी शब्दों में हैं मधु सी मिठास अलंकारों से रहती अलंकृत शृंगारों से रहती श्रृंगारित दुल्हन सी लगती मेरी हिंदी सबसे प्यारी मेरी हिंदी देवनागरी हैं इसकी लिपि संस्कृत हैं इसकी जननी साहित्य हैं इसका निराला कवियों की हैं जान हिंदी सबसे प्यारी मेरी हिंदी

प्रद्युम्न-श्रद्धांजलि

प्रद्युम्न-श्रद्धांजलि बड़े प्यार से स्कूल भेजा, माँ ने अपना दुलारा l नहीं जानती थी, नहीं अब वो आएगा दुबारा ll बेफिक्र थी ये सोचकर वो स्कूल पहुंच चुका है l नहीं पता था स्कूल में ही साँसे छोड़ चुका है ll सुनकर खबर बच्चे की माँ का कलेजा थरथराया l क्या हुआ जो दरिंदे ने उसे मौत की नींद सुलाया ll मेरे लाल की आँखे न होती,ये देख तो ना पाताl मेरा लाल मुझे छोड़कर मुझसे दूर तो ना जाता ll मासूम चेहरे को देखकर भी दरिंदे को दया न आई l बड़ी बेहरमी से उसकी गर्दन पर उसने छुरी Continue reading प्रद्युम्न-श्रद्धांजलि

यूपी दुर्घटना विशेष

यूपी दुर्घटना विशेष यूपी दुर्घटना पर (जहाँ 30 मासूम बच्चों ने आक्सीजन के अभाव में दम तोड़ दिया).. . बच्चों के जीवन मृत्यु पर थोड़ा-सा तो गौर करते पैसे ही लेने थे जब तो काम कोई तुम और करते . ये मत सोंचो तुमने केवल आक्सीजन ही बंद किया बल्कि तुमने 30 मासूम धड़कनों को बंद किया . आक्सीजन तो तुम्हारी थी,रक्खो तुम ही पीयो तुम मरने वाले कौन सगे थे? खूब मस्ती में जीयो तुम . माना कि घटनास्थल पर फूटा बम नही है लेकिन किसी आतंकी हमला से यह कम नही है . तुमने मानवता को बिलकुल शर्मसार Continue reading यूपी दुर्घटना विशेष

पीड़ा के पलने पर पलता

पीड़ा के पलने पर पलता प्यार नहीं था पछताता। आँसू भी आँखों में आकर नहीं सिसकने अकुलाता। मुस्कानें मुस्काती दिखती जब मिलती थीं मुस्कानों से यादों की झुरमुट में छिपकर मिलते थे प्रियजन अपनों से। पर पलकों के पीछे आँसू कुछ भी कह नहीं था पाता। पीड़ा के पलने पर पलता प्यार नहीं था पछताता। जाने कितनी मीठी बातें प्यार प्यार से बतियाता था हँसता था, मुस्काता रहता पर मन ही मन शर्माता था। प्यारी छवि तब प्रेमभाव की देख हृदय था हर्षाता। पीड़ा के पलने पर पलता प्यार नहीं था पछताता। हम थे और सफर था अपना पथ के Continue reading पीड़ा के पलने पर पलता

निशा प्रहर में

निशा प्रहर में क्यूँ निशा प्रहर तुम आए हो मन के इस प्रांगण में? रूको! अभी मत जाओ, तुम रुक ही जाओ इस आंगन में। बुझती साँसों सी संकुचित निशा प्रहर में, मिले थे भाग्य से, तुम उस भटकी सी दिशा प्रहर में, संजोये थे अरमान कई, हमने उस प्रात प्रहर में, बीत रही थी निशा, एकाकी मन प्रांगण में… क्यूँ निशा प्रहर तुम आए हो मन के इस प्रांगण में? रूको! अभी मत जाओ, तुम रुक ही जाओ इस आंगन में। कहनी है बातें कई तुमसे अपने मन की! संकुचित निशा प्रहर अब रोक रही राहें मन की! चंद Continue reading निशा प्रहर में