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भूकंप

प्रकृति का कंपन कम्पित हो गया जीवन विनाश का रूदन त्रस्त है जनगण अनहोनी के लक्षण हताश नहीं पर मन करेगें पूनः गठन सम्पादित होगें नए सपंदन अश्रुजल
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शायरी-११

आसान थे जो रास्ते, दूसरों की नज़रो में, पार करने वालों से पूछिए, कितनी मेहनत लगती हैं, इस छोर से, उस पार उतरने में ॥ ‘विराज’
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मरहले 2

जब दर्द उठता है तेरी यादो का इस दिल में, मैं खोल देता हूँ. जब ना बिकते हैं आंसू गम के बाजार में, मैं मोल देता हूँ. जब
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“अनसुनी यादें”

सुनो आज कुछ सुना देता हूं मैं, तू साथ है मेरे तो गुनगुना लेता हूं मैं. -> वक्त ना जाया कर, वो तो एहसानफरामोश है. मेरे गीत लबों
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प्रेम गाथा

चाँद-तारों की बातों में प्रेम जताने चांदनी का जिक्र आता खिले फूलों की मादकता समझाने भंवरें-तितलियों की गाथा किसी नशे के हालात पर सुरा संग शाकी का जिक्र
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वक्त

वक्त से सीखा की वक्त किसी के लिये रूकता नहीं वक्त ने ही जताया, वक्त सब का एक सा चलता नहीं बदलते वक्त के साथ जो बदल गये,उन्हें
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