इन्द्रवज्रा (शिवेंद्रवज्रा स्तुति)

इन्द्रवज्रा (शिवेंद्रवज्रा स्तुति) “शिवेंद्रवज्रा स्तुति” परहित कर विषपान, महादेव जग के बने। सुर नर मुनि गा गान, चरण वंदना नित करें।। माथ नवा जयकार, मधुर स्तोत्र गा जो करें। भरें सदा भंडार, औघड़ दानी कर कृपा।। कैलाश वासी त्रिपुरादि नाशी। संसार शासी तव धाम काशी। नन्दी सवारी विष कंठ धारी। कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।१।। ज्यों पूर्णमासी तव सौम्य हाँसी। जो हैं विलासी उन से उदासी। भार्या तुम्हारी गिरिजा दुलारी। कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।२।। जो भक्त सेवे फल पुष्प देवे। वाँ की तु देवे भव-नाव खेवे। दिव्यावतारी भव बाध टारी। कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।३।। धूनी जगावे जल को चढ़ावे। जो भक्त Continue reading इन्द्रवज्रा (शिवेंद्रवज्रा स्तुति)

यार बचपन तू कहाँ खो गया

घनन-घनन गरजते मेघ काली घटाओं की मस्ती वो रिमझिम वर्षा का पानी वो कागज की टूटी कश्ती बचपन यार तू कहाँ खो गया मुझे जगाकर तू क्यों सो गया  वह कटी पतंग को झपटना वो छीना-झपटी में उलझना यारों की पतंग को काटना फिर झगड़ों का सुलझना बचपन यार तू कहाँ खो गया न जाने कहाँ तू गुम हो गया लुका-छिपी की वह दोपहर वो होली का महकता रंग वो शिकायतों का अनंत दौर अपने रूठे हुए यारों के संग बचपन यार तू कहाँ खो गया आज तू याद आया तो रो गया ताल कटोरा गार्डन जाकर वो कच्ची अमिया Continue reading यार बचपन तू कहाँ खो गया

आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। पोंछ पोंछकर सब अश्रूकणों को नव सपनों का निर्माण करें पलकों के आँगन में फिर से हम मुस्कानों का सुन्दर रास रचें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। गीतों में अमृत का संचार कर स्वप्न गीत का यूँ श्रंगार करें। युग युग से पीड़ित अपने मन की पीड़ा कंठों की सब दूर करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। तेरी गोदी में सोकर हम सब फिर से सुखद सपन उपजायें जब जागें तो हम सब मिलकर दिव्य स्वप्न सब साकार करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। सपनों में दर्शन तेरा पाकर जग क्रंदन Continue reading आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

ऐसा दर्द न देना मुझको

ऐसा दर्द न देना मुझको  मैं आँसू बनकर घुल मिट जाऊँ इतना भी निर्धन मत करना मैं धूल कणों में जा छिप जाऊँ। इतनी पीड़ा मत पनपाना मैं काँटों का पलना बन जाऊँ फूलों का गर स्पर्श मिले तो आहत हो मैं पतझर बन जाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं शाप दर्द का बन पछताऊँ। भूखी इतनी रात न देना मैं करवट करवट चीख न पाऊँ और सुबह की प्रथम किरण में अपनी आँखों कुछ देख न पाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं बिन मुस्काये ही मर जाऊँ। इतना नाजुक भी मत करना मैं दरक-दीप सा फेंका जाऊँ Continue reading ऐसा दर्द न देना मुझको

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी खुशी की बहार लाती है हवायें भी। यह पहले भी सुना था देर नहीं है जमीं पर बिखरेंगी रब की दुआयें भी। मेरी आँखें ढूँढ रही उसी चाँद को जिसे छिपाये है सावन की घटायें भी। ‘भूख लगी है’ बच्चे आते ही कहेंगे थाल परोसे रखती हैं मातायें भी। कैद हो या जमाने की कालकोठरी सभी को सहन करनी होगी सतायें भी। बच्चों की हर खुशी में महक होती है महक नहीं रखती है बूढ़ी अदायें भी।                       … भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

शरद ऋतु मेरे बगियन की

शरद ऋतु मेरे बगियन की स्वेत चांदनी बिखरी पड़ी है ठंडी आहें भरे बावरी बयार मेरी कांच की बगियन में झूमे अमलतास झूमे मैगनोलिया कांच की चादर ओढ़े झूमती धरा मेरी स्वेत बगियन में कांच की बालियाँ पहने थिरकती गुलाब की कोमल पाँखुरी मेरी चांदनी बगियन में कांच के कंगन पहनकर खनखनाता पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा मेरी उज्ज्वल बगिया में शीतल पौन चूमती पत्तियों के ठन्डे कपोलों को मेरी दमकती बगियन में उत्तरी ध्रुव से झूमती आयी शरद की मादक पावन बेला मेरी हर्षाती बगियन में (किशन नेगी ‘ऐकांत’ )

अविरल यात्रा

अविरल यात्रा चलते चलतेउबड़-खाबड़ राहों मेंमुसाफ़िर ठहर गया कुछ सोचकरदेखता मुड़कर पीछेअपने ही पांवो के निशाँदबे थे जिनके नीचे कुछ दर्दकुछ वेदनाओं के असहनीय घावअतीत की ख़ौफ़नाक परछाईयाँकुछ भूली-बिसरी यादेंजिन्हें वह भूल जाना चाहता हैमगर कुछ जख्म जो अभी हरे थेरुक-रुक कर चुभते थे बन कर सूलअतीत के बंद काले पन्नेकभी चिढ़ाते, कभी घूरते उसकोसिंदूरी आँचल तले ढलती सांझसूरज भी हुआ मध्यम क्षितिज मेंभोर के चले पंछी थकान समेटेलौट चले रात्रि विश्राम कोअचानक दे कर तिलांजलिअसमंजस के क्षणों कोबढ़ चले ठिठकें कदम मुसाफिर केशायद अहसास हो चला था उसे किकर्मयोगी ही रहता है सदाअग्रसर अपने कर्मपथ पर(किशन नेगी ‘एकांत’ )

पड़ोसी लौट आ

पड़ोसी लौट आ एक वक्त वह भी देखा था मैंने बचपन मेंजब पड़ोसी भी हुआ करता था मेरे परिवार का एक अहम् सदस्य घर के अनेक निर्णयों में होती उसकी अनूठी भागीदारी सुख-दुःख का परम मित्र फुर्सत के क्षणों का अद्भुत साथी तन्हाई भरे लम्हों में झरते आंसुओं की भाषा समझता और आज उम्र के इस पड़ाव में देखता हूँ कि मेरे ही परिवार के सदस्य बन गए हैं एक दूजे के पडोसी और धूल की परतों में लिपटा हुआ मैं उनका पडोसी (किशन नेगी ‘एकांत’ )  

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है। गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है। याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है। मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है। पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है। पंख फैलाये Continue reading मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

इन आँखों की मस्ती

इन आखों की खुमारी, इन आँखों की मस्ती, नीली झील में तैरती, प्यार की कोई कश्ती। शबनम की नन्हीं बूंदें, इन्हीं नैनों में बसती है, इन्हीं की अंजुमन में, चांदनी रात सजती है। इन मदहोश आँखों से, भर गए हैं सारे पैमाने, चली है जब से ये खबर, बंद पड़े हैं मयखाने। चारु चंद की चंचल किरणें, दमकती पल-पल, जिनकी आहट से, सारे जहाँ में मची हल-चल। रातें भी कटती नहीं, तेरी यादों की तन्हाईयौं में, दिल ढूंढता है तुझे, धड़कनों की शहनाइयों में। झील-सी नीली आँखों में, कभी मेरा सारा जहाँ, दिल-ए-नादाँ तड़पता यहाँ, तड़पती है तू कहाँ ] इन Continue reading इन आँखों की मस्ती

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ सुरक्षित नहीं अब तू इस धरा पर पहले से राक्षस घात लगाए बैठे हैं हूँ अबला इसलिए सक्षम नहीं कि रक्षा कर सकूँ तेरी क्योंकिं यहाँ खतरे में मेरी भी आबरू अगर तू आ भी गयी मेरी दहलीज पर तो ये नरभक्षी नोच डालेंगे तुझे तब देख न पाएंगी मेरी सहमी आंखें चीरहरण तेरा इन दरिंदों के हाथों अस्मिता तेरी सुरक्षित है तभी तक जब तक धरे न पाँव तू इस जमीं पर मेरी अजन्मी बेटी कहते सब हैं बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ पर जब आती है बेटी घर में खुशियों की सौगात लेकर न जाने Continue reading बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

सूखती नदी

चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! संग ले चली थी, ये असंख्य बूँदें, जलधार राह के, कई खुद में समेटे, विकराल लहरें, बाह में लपेटे, उत्श्रृंखलता जिसकी, कभी तोड़ती थी मौन, वो खुद, अब मौन सी हुई है… चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! कभी लरजती थी, जिसकी धारें, पुनीत धरा के चरण, जिसने पखारे, खेलती थी, जिनपर ये किरणें, गवाही जिंदगी की, देती थी प्रवाह जिसकी, वो खुद, अब लुप्त सी हुई है….. चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! अस्थियाँ, विसर्जित हुई है जिनमें, इस सभ्यता की नींव, रखी है Continue reading सूखती नदी

दरिया का किनारा

हूँ मैं इक दरिया का खामोश सा किनारा…. कितनी ही लहरें, यूँ छूकर गई मुझे, हर लहर, कुछ न कुछ कहकर गई है मुझे, दग्ध कर गई, कुछ लहरें तट को मेरे, खामोश रहा मै, लेकिन था मैं मन को हारा, गाती हैं लहरें, खामोश है किनारा…. बरबस हुई प्रीत, उन लहरों से मुझे, हँसकर बहती रही, ये लहरें देखकर मुझे, रुक जाती काश! दो पल को ये लहर, समेट लेता इन्हें, अपनी आगोश में भरकर, बहती है लहरें, खामोश है किनारा…. भिगोया है, लहरो ने यूँ हर पल मुझे, हूँ बस इक किनारा, एहसास दे गई मुझे, टूटा इक Continue reading दरिया का किनारा

संघर्ष से स्वाभिमान तक

शब्द, गान विलुप्त हुए, मौन था अबाधित अव्यक्त, अछूता व्यक्तित्व, दिवस -रात्र संवाद रहित मुखर, चपल वर्चस्व हो गया पूर्णतया पराजित अंतःकरण में अंतर्द्वन्द, विकलता समाहित ।। रंगमंच पर अभिनीत ज्यों हर पल अनुभव दुःख सुख के आए वेष बदल अवलंबन से कुंठा हुई प्रबल अवहेलित, तृषित दृग सदा सजल।। निश्छल मन की पुलक थी कहीं खोई व्यथाओं से शिथिल मन हुआ निर्मोही उल्लास, उमंग की जो सृष्टि संजोई उस पथ से भटक गया बटोही।। प्रतिभा ने आशा का खोल दिया द्वार प्रज्वलित ज्ञान दीप से कल्पना हो उठी साकार सार्थक हो रहे स्वप्न विचार ले रहे आकार साधना में Continue reading संघर्ष से स्वाभिमान तक

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग) चांदनी रात में मुस्कुराते हुए चाँद को देख पत्नी के दिल में प्रेम के बादल बहकने लगे जैसे किसी रूठे हुए बांसुरी के अनजान सुर बसंत के आँगन में खुशबु बन महकने लगे फिर बोली साजन से बोलो मुझे दो ऐसी बातें पहली बात से हो जाऊँ मैं ख़ुशी से रसगुल्ला और फिर कहो बात दूसरी कोई मेरे सनम सुन कर जिसे हो जाऊँ में तुरंत आग बबूला सुनो जानम कहता हूँ दिल की पहली बात देखा है जब से चाँद तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो नहाये जब ये चाँद झील-सी नीली आँखों में Continue reading लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)