पीने की आदत

पीने की आदत बेवजह रूसवाई सहने की आदत हो गई मुझ को तो यों दर्द छुपाने की आदत हो गई लोग न समझे बेवफ़ाई के दर्द की खराबी मुझे तो अब इल्जाम सुनने की आदत हो गई दिन- रात जब बेचैन होने की आदत हो गई तभी तो मयखाने में जाने की आदत हो गई लोग कहते पागल या कोई जानते शराबी ग़म को भुलाने ज़ाम छलकाने की आदत हो गई मुझे तो यों बदनाम होने की आदत हो गई कैसे कहे सजन को पीने की आदत हो गई सजन Advertisements

Advertisements

दिल की बात

दिल की बात दिल की बात कहने को अभी न दिल ही चाहता मतलबी दिलों को दर्द सुनाना नहीं चाहता या खुदा ये दुनिया में अपना ही मुँह चुप रखें मुश्किल जो है दुसरों को देना नहीं चाहता परेशानी खुद की उन्हे कितनी उलझा रखे उन को आवाजे दे पछताना नहीं चाहता बदलते जमाने के साथ अब बदलना होगा न कोई पूछता, ना ढूँढे और नहीं चाहता ग़म बटोर संवारने लगा गया अब अकेला जज्बात बज़ार में मज़ाक बने नहीं चाहता लिख-लिख कर ‘कलम’ खूद आंसुओं से धो लेता हालात पे कुछ लिखने का बहाना ही चाहता कलम उठाइ मैंने Continue reading दिल की बात

बेवफ़ाई

बेवफ़ाई कुछ ग़म-ए-अब्र का हिसाब आए बेवफ़ाई में दर्द गज़ब आए जलते जख़्म में तड़पन भर आए तन्हा हुवे जाम- ए-शराब आए रगो मे तेज़ाब सा दौड़ जाए नशे में ग़म के माहताब आए तिरी बेवफ़ाई के अब्र छाए गोया हर सितम से रिसाव आए के तभी होश-व-हवास गंवाए साक़ी ज़ाम में आफ़ताब आए क़हर-ए-बेवफ़ा से घाव पाये सामने दस्तुर बेनक़ाब आए मन में उम्मीदों के अब्र छाए या अल्लाह हाँ में जवाब आए मेहेर- ओ- वफ़ा को तरस जाए तु सजन को याद बेहिसाब आए सजन

जज़्बात

जज़्बात उदासी में दिल को आँसु से राहत कहाँ मिले जुगनुओं से रोशन रात को रौशनी ना मिले आंखों से बरस पीड़ा का सैलाब उमड़ पड़े जज़्बातों को मिटा दे वो हमदर्द कहाँ मिले रखता दिल में महफूज़ अपने अरमान सारे कोई हमसफ़र या हमदर्द जब मुझे ना मिले हर वक़्त सभी बदगुमानी दिल पे भारी पड़े अब दर्द नहीं होता मुझे जब खूशी ना मिले आँसू को कितना समझाया बेवक्त ना झरे सजन सभी एहसासों का कभी जवाब ना मिले सजन

प्यार का मसौदा

प्यार का मसौदा तेरी चाल में बिजली की अदा है तेरी लटों का लहराना जुदा है नज़र के नशीले तीर जो चलाये गुलाबी लब पर ये दिल भी फ़िदा है देखा जो तो देखते ही रह गये चेहरा कमल फूल सा संजीदा है मुस्कुरा के तुम बर्क़ गिराते गये दिल मीठे सा दर्द से ग़मजदा है ख़ुशबू बिखेर यों आँचल फहराये चलने में किया मस्त मस्त अदा है नभ में बर्क़ जैसे चमकती जाये आशिकी में हर दिल तुम पे फिदा है हुस्न की मार ने मारा सजन तुझे ज्यों शोला भड़कता वो मसौदा है सजन

जुस्तज़ू

जुस्तज़ू प्यार से महकाए ज़िंदगी ये जुस्तजू सदा रहे दुआ करे हर दिल अज़ीज़ हो पाए इरादा रहे दिल में ये तमन्ना रहे हर किसी से प्यार मिले दर्द का समंदर पी मुस्कुराए ऐसा वादा रहे इन्सान बने जैसे इन्सानियत का नतीज़ा मिले ज़रूरी है जो कमी रही मिटाने संजीदा रहे जुस्तजू है तनहाई की क़ैद से रिहाई मिले भरना है हर दिल का जख़्म कोई न ग़मजदा रहे मुमकिन कर के सारे रिश्तों को भी रोशन कर ले बच्चों से प्यार करे और बड़ों को सजदा रहे दुनिया की भीड़ में अकसर चेहरे गुम होते मिले रखनी अगर पहचान Continue reading जुस्तज़ू

बचपन

बचपन बचपन की वह शरारत वह जमाना याद आता है खूब वारिश में भिगना नाहना याद आता है दौड़ा भागी खेल कुद और कितनी कितनी यादें काग़ज की कस्ती बनाकर बहाना याद आता है बचपन की वह बाहदुरी ना जाने कहाँ खो गई कभी छत की मुंडेर पर पांव चलाना याद आता है बचपन की वह दिलेरी ना जाने अब कहाँ खो गई टिफिन बक्स से दोस्त को खिलाना याद आता है बचपन की वह बात सारी न जाने कहाँ खो गई मित्र के दुख में आंसु निकल जाना याद आता है न जाने क्यों सजन को अब बचपन बहुत Continue reading बचपन

एहसास प्यार का

एहसास प्यार का बहार छाई तेरे इकरार में हसीन लगते नज़ारे प्यार में भूला गए लाखों गम संसार के तेरे ही प्यार के इज़हार में सपने देखते रहते मिलन के वक्त नागवार है इन्तजार में गुज़ारे जिंदगी यों हँस खेल के टुटे न अपना रिश्ता मझधार में ख्वाब है छोटी सी ज़िन्दगी के ना जा पाये ग़म के अधिकार में हक़ीकत पाए सपने बिश्वास के समय ना बीते किसी तक़रार में साथ जीए मरे सभी को जता के सजन सदा ही इतराय प्यार में सजन

चाहत

चाहत बड़ी मुश्किल शरारत हो गयी है न पूछो यह बगावत हो गयी है नज़ाक़त तेरी रास आये नही ग़म से अब मोहब्बत हो गयी है अँधेरा जैसा लगता है यों ही दिल की कंही तिज़ारत हो गयी है फ़रेब व जालसाजी के हुनर से बेवफ़ाई कि आदत हो गयी है माना नाउम्मीदी की घडी़ में एक उम्मीद की चाहत हो गयी है हालात ऐसे से हो गए मेरे तु मेरे लिए इबादत हो गयी है सच तो यह है न कोई अफ़साना सजन तुझे मोहब्बत हो गयी है सजन

अब तो तू आजा प्रिये

अब तो तू आजा प्रिये अब आया समझ में,मैं ना समझ नहीं प्यार हैं,चाहत हैं,उन्माद नहीं सूना-सूना सा जीवन है कुछ शोक नहीं,जीवन में तैर सिवा कोई और नहीं अब इस दिल को कोई स्वीकार नहीं दिल मेरा हर बार तड़पता, तुझे चाहता अब तो तू आजा प्रिये .. जिंदगी मुझसे रुठ चुकी तेरी चाहत बढ़ चुकी तेरे लिए भटका हर दर-दर मैं गलियां मेरे हाथों से टूट चुकी कोमल-कोमल कलियाँ खो बैठा अपनी नादानी से प्यार भरा अपार कोष प्रिये फिर कर लेने दो प्यार प्रिये .. तेरे बिन अब ये दिल ना जियें अब तो तू आजा प्रिये…

एक उम्मीद

एक उम्मीद जग ऐसा कोई बनाई दे सबको दोस्त से मिलाई दे रिश्तों से जो परेशान ना हों वो नूर आँखं पे चढा़ई दे गंगा-जमुना तहजीब में दिखे भाईचारे का जग बनाई दे मन्दिर मस्जिद में भेद काहे शंख अजा़ं साथ सुनाई दे ईद दिवाली एक सी मनाये आदाब मिले या बधाई दे होली हुड़दगं की मस्ती हो हर कोई अपना दिखाई दे सजन

माँ

माँ माँ शब्द है जिन दिलो में यहाँ, पार हूॅआ है जग जूलो में यहाँ। दुःख की परछाईयों में जो घिरा , छलकते थे दर्द आंखो में वहाँ। माफ़ किया है उसी माँ ने सदा , हम सभी गुनाहगारो है यहाँ। बरसती उस ह्रदय से दुआ सभी , कामयाबी आज ढेरो है यहाँ। नींद लेते सुख सपने देखते, जागती वो रात हजारो है यहाँ। साथ में वो रोई थी हमारे कभी , राह में खाई ठोकरों में यहाँ। बात से उनकी कहानी निकले, फिरते थे फूल तारों में यहाँ। देखती थी मूरते मंदिर में , फिरभी माँ को हूँ प्यारो Continue reading माँ

अचिन्हित तट

अचिन्हित तट ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर, सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट? अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश्छल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. निश्छल, निष्काम, मृदुल, सजल तेरी ये नजर, विरान फिर भी क्यूँ तेरा ये तट? सजदा करने कोई, फिर क्यूँ न आता तेरे तट? बिन पूजा के सूना क्यूँ, तेरा मंदिर सा ये निर्मल तट? ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट…. Continue reading अचिन्हित तट

श्वेताक्षर

श्वेताक्षर यह क्या लिख रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? रुखड़े से मेरे मन की पहाड़ी पर, तप्त शिलाओं के मध्य, सूखी सी बंजर जमीन पर, आशाओं के सपने मन में संजोए, धीरे-धीरे पनप रहा, कोमल सा इक श्वेत तृण………… क्या सपने बुन रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वो श्वेत तृण, इक्षाओं से परिपूर्ण, जैसे हो दृढसंकल्प किए, जड़ों में प्राण का आवेग लिए, मन में भीष्म प्रण किए, अवगुंठन मन में लिए, निश्छल लहराता वो श्वेत तृण………….. क्या तप कर रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में? वियावान सी उजड़ी मन की पहाड़ी पर, इक क्षण को हो जैसे Continue reading श्वेताक्षर