पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। जीवन पाकर सब अपना अपना पथ अपनाते चलने का उत्साह लिये वे बस चलते जाते नजर उठी रहती सबकी अपनी मंजिल पाने पर पथ के पत्थर वे सब देख नहीं हैं पाते कौन पाँव किधर रखेगा हर पथ हैं जाने किसको ठोकर देना हर पत्थर है जाने। खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। ठोकर खा गिरनेवाले पलपल गिरते जाते गिरकर उठते आहें भर साँसें गिनती जाते गिरते गिरते Continue reading पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

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कृष्णावतार

कृष्णावतार (रास छंद। 8,8,6 मात्रा पर यति। अंत 112 से आवश्यक और 2-2 पंक्ति तुकांत आवश्यक।) हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ। घोर घटा में, कड़क रही थी, बीजलियाँ हाथ हाथ को, भी ना सूझे, तम गहरा। दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।। यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी। विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी। मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया। कारा-गृह में, जन्म लिया था, मझ रतिया।। घोर परीक्षा, पहले लेते, साँवरिया। जग को करते, एक बार तो, बावरिया। सन्देश छिपा, हर विपदा में, धीर रहो। दर्शन चाहो, प्रभु के तो हँस, कष्ट सहो।। अर्जुन Continue reading कृष्णावतार

मेरी जन्मभूमि

मेरी जन्मभूमि है ये स्वाभिमान की, जगमगाती सी मेरी जन्मभूमि… स्वतंत्र है अब ये आत्मा, आजाद है मेरा वतन, ना ही कोई जोर है, न बेवशी का कहीं पे चलन, मन में इक आश है,आँखों में बस पलते सपन, भले टाट के हों पैबंद, झूमता है आज मेरा मन। सींचता हूँ मैं जतन से, स्वाभिमान की ये जन्मभूमि… हमने जो बोए फसल, खिल आएंगे वो एक दिन, कर्म की तप्त साध से, लहलहाएंगे वो एक दिन, न भूख की हमें फिक्र होगी, न ज्ञान की ही कमी, विश्व के हम शीष होंगे, अग्रणी होगी ये सरजमीं। प्रखर लौ की प्रकाश Continue reading मेरी जन्मभूमि

15 अगस्त

15 अगस्त ये है 15 अगस्त, स्वतंत्र जब हुआ ये राष्ट्र समस्त! ये है उत्सव, शांति की क्रांति का, है ये विजयोत्सव, विजय की जय-जयकार का, है ये राष्ट्रोत्सव, राष्ट्र की उद्धार का, यह 15 अगस्त है राष्ट्रपर्व का। याद आते है हमें गांधी के विचार, दुश्मनों को भगत, आजाद, सुभाष की ललकार, तुच्छ लघुप्रदेश को पटेल की फटकार, यह 15 अगस्त है राष्ट्रकर्म का। विरुद्ध उग्रवाद के है यह इक विगुल, विरुद्ध उपनिवेशवाद के है इक प्रचंड शंखनाद ये, देश के दुश्मनों के विरुद्ध है हुंकार ये, यह 15 अगस्त है राष्ट्रगर्व का। ये उद्घोष है, बंधनो को तोड़ने Continue reading 15 अगस्त

सुबह का अखबार

सुबह का अखबार वो सुबह का अखबार पढ़ के रो रहा था कातिल था, अपने गुनाह पढ़ के रो रहा था।   वो कह न सका पाँव के काँटे निकाल दो उस गूँगे के हाथ कटे थे, रो रहा था।   फुटपाथ पड़ी लाश में माँ ऊँघ रही थी उसका बच्चा पास लेटे, रो रहा था।   जमाना चाह रहा था कि मैं भी रो पडूँ इसलिये मेरी हर खुशी पे, रो रहा था।   दर्द अब उस अश्क का देखा नहीं जाता जो मुस्कराहट में लुक-छिप के, रो रहा था।   पढ़ के गजल वो इतना तो समझा होगा Continue reading सुबह का अखबार

मुक्तक-खुश्बू

 मुक्तक — खुश्बू कलियों को कुछ और सँवर जाने दो फूलों को कुछ और निखर जाने दो। अभी कुछ चाह बाकी है जीने की खुश्बू को कुछ और बिखर जाने दो। ——  भूपेन्द्र कुमार दवे            00000

गीत समर्पित तुझको करने

गीत समर्पित तुझको करने गीत समर्पित तुझको करने कुछ चाहत मन में आती है। तेरे  ही  संगीत  धुनों  में लय  बँधती गुँथती जाती है।   है  शाश्वत  संगीत तुम्हारा इनसे हम क्या ताल मिलायें मेरे गीतों  की  नश्वर लय क्षणभंगुरता   ही   दर्शायें   मेरे  साँसों की  लहरें  तो लघुता  अपनी  दर्शाती  हैं। गीत समर्पित  तुझको करने कुछ चाहत मन में आती है।   तेरा  तो  है  संगीत  अमर प्रतिध्वनि-सा अनंत समय का सृष्टि सृजन के भी पहले का शब्दनाद-सा विकट प्रलय का   मेरे मन की उठती लहरें तो लघुमंथन की  बस होती  हैं गीत समर्पित तुझको करने कुछ चाहत Continue reading गीत समर्पित तुझको करने

तेरा गर साथ नहीं तो

तेरा गर साथ नहीं तो  तेरा गर साथ नहीं तो है पास कुछ भी नहीं सैकड़ों कारवाँ का होना साथ कुछ भी नहीं।   अनंत-शून्य में है फासला खास कुछ नहीं खुदा! तेरे आगे ये कायनात कुछ भी नहीं।   सच कहेगा सच, सच के सिवाय औ कुछ नहीं झूठ सुनेगा झूठ, उसके सिवा कुछ भी नहीं।   न्याय की अवमानना अब मैं भला क्यूँकर करूँ सजा तो खूब मिली पर था गुनाह कुछ भी नहीं।   खामोशी न खुद कहती है, न कहने देती है सन्नाटों में खुसफुसाहट है, आवाज कुछ भी नहीं।   ए शोले! तू ऐसा न Continue reading तेरा गर साथ नहीं तो

मेरे गीतों की आवाज

मेरे गीतों की आवाज मेरे  गीतों  की  आवाज जाने  कहाँ चली जाती है। सन्नाटों में  प्रतिध्वनित हो जाने कहाँ बिखर जाती है।   ढूँढ़  रहे हैं  वाद्यवृन्द भी कंपित  कोमल  कलियों में ढूँढ़ रहे हैं  महक सलोनी खिलती नाजुक पंखुरियों में   पूछें भ्रमरों से उनकी गुंजन जाने कहाँ सिमट  जाती है। मेरे  गीतों   की  आवाज जाने  कहाँ चली जाती है।   दूर गगन में  उड़ते  पंछी अपनी साँसों थाम सकें तो रंग-बिरंगी  पंख  खुले  से उड़ान अपनी थाम सकें तो   बैठ डाल पर उनसे  पूछें जाने कहाँ बिखर जाती है। मेरे  गीतों  की  आवाज जाने  कहाँ चली जाती Continue reading मेरे गीतों की आवाज

जंग लगी मेरी वीणा को

 जंग लगी मेरी वीणा को  सूखी डाली हरियाने को तुम आँसू मेरे बहने दो जंग लगी मेरी वीणा को अपनी धुन में बजने दो।   फूल नहीं तो शूल समझकर दामन में  अपने उलझा लो प्रतिकूल लगे बंधन फिर भी तुम मुक्त न मुझको होने दो।   बनकर मैं दीपक की बाती जलता हूँ तो जल जाने दो धुआँ बने मँडराते मन को काजल-सा ही बन जाने दो।   हर आँधी  में  पाल बिंधाकर तुम मुझको  आहत  होने दो जीवन-जल का  कीच छिपाने तुम कमलरूप बस बन जावो।   कुंठाओं के  नीड़  बनाकर बस उसमें मुझको पलने दो टूटे बिखरे  Continue reading जंग लगी मेरी वीणा को

मेरा जीवन पूरा तूने

मेरा जीवन पूरा तूने मेरे पुण्य कर्म को तूने पापों की श्रेणी में रखकर और मधुरवाणी को मेरी कटुता का ही भेद बताकर मेरा जीवन पूरा तूने दूषित रंगों में मथ डाला अब साँसें ही मचल रही हैं तज पंखों को उड़ जाने को और नीड़ में बैठी श्रद्वा बस व्याकुल है कुछ पाने को पर तूने श्रद्वा सुमनों को भक्ति विमुख ही कर डाला मेरा जीवन पूरा तूने दूषित रंगों में मथ डाला तन ही मेरा शेष बचा है ज्यों इक सीपी रेत पड़ी हो और लहर के आते-जाते लुढ़क लुढ़ककर टूट पड़ी हो तूने तो जीवन आशा को Continue reading मेरा जीवन पूरा तूने

सूनी सूनी साँसों के सुर में

सूनी सूनी साँसों के सुर में सूनी सूनी  साँसों के सुर में ये  आँसू कब तक  थिरकेंगे। कभी कहीं  ये आवाज थमेगी अब जग में ना आँसू बरसेंगे।   ये साँसें  हैं  दीप  सरीखी इक जलती है, इक बुझती है धुँआ बाती-सी जीवन ज्योति जलती     है,  ना  बुझती है।   दिव्य ज्योति जब आँखों में हो तो आँसू   मोती  से   ही  चमकेंगे सूनी  सूनी   साँसों  के  सुर में ये   आँसू  कब  तक   थिरकेंगे।   तरस रहे हैं बूँद बूँद को पनघट पनघट  खाली है साँसों का भंडार  भरा है जीवन  गागर  खाली है।   दरक उठी जब माटी की गागर हर Continue reading सूनी सूनी साँसों के सुर में

उम्र की दोपहरी

उम्र की दोपहरी उम्र की दोपहरी, अब छूने लगी हलके से तन को… सुरमई सांझ सा धुँधलाता हुआ मंजर, तन को सहलाता हुआ ये समय का खंजर, पल पल उतरता हुआ ये यौवन का ज्वर, दबे कदमों यहीं कहीं, ऊम्र हौले से रही है गुजर। पड़ने लगी चेहरों पर वक्त की सिलवटें, धूप सी सुनहरी, होने लगी ये काली सी लटें, वक्त यूँ ही लेता रहा अनथक करवटें, हाथ मलती रह गई हैं,  जाने कितनी ही हसरतें। याद आने लगी, कई भूली-बिसरी बातें, वक्त बेवक्त सताती हैं, गुजरी सी कई लम्हातें, ढलते हुए पलों में कटती नहीं हैं रातें, ये Continue reading उम्र की दोपहरी

आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है

आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है रात ने भी पसंदीदा जेवर जुदाकर रखा है। जुगनूओं की बारात भी चुपचाप चल रही है रात ने गहन सन्नाटा जो सजाकर रखा है। रातरानी ने बगिया को महकाकर रखा है रात ने लेकिन द्वार अपना सटाकर रखा है। जलाकर रखा दीप भी किस आस में जगता रहे उजाले को अंधेरे ने खूब डराकर रखा है। बेशुमार यादों ने भी करवटें बदल बदलकर इंतिजार की कसक को महज जगाकर रखा है। आपके वादे भी गुमसुम हुए से बैठे हैं स्याह रात ने उनको बंदी Continue reading आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है

किसी को चाहता तो हूँ

किसी को चाहता तो हूँ किसी को चाहता तो हूँ मगर बतला नही सकता, कोई किमत्त अदा कर दूँ उसे मै पा नही सकता। कि तुमने ही तो पैदा की है ये मजबूरियाँ मौला, वो पास आ नही सकती मै दूर जा नही सकता।। ©सत्येन्द्र गोविन्द मुजौना,नरकटियागंज, पश्चिमी चम्पारण,बिहार :-8051804177