गरीब माँ

गरीब माँ वह माँ यशोदा की तरह उसे प्यार करती है वह अपने बच्चे को ही भगवान समझती है। बच्चा भी अपनी माँ को भगवान समझता है इसलिये माँ भी उसे दिल से प्यार करती है। कितनी मासूम होती है शरारत बच्चे की वह खिलखिलाकर हँसता है, जब डाँट पड़ती है। ‘माँऽ माँऽ’ चिल्लाता बच्चा माँ को ढूँढ़ता है गरीब माँ उसे भूखा देख छिपती फिरती है। माँ और बेटा गहरी नींद लेते रहते हैं भूखी गरीबी पास बैठी रोती रहती है। रोटियाँ तवे पे आते ही जलने लगती हैं सच में, गरीबी की आँच बड़ी तेज रहती है। …. Continue reading गरीब माँ

माँ के आँसू की गरिमा।

माँ के आँसू की गरिमा। सबकी आँखें गीली करता जीवन है आँसू की गाथा मोती जैसे आँसू चुनकर रचता है पीड़ा की माला। सिसक सिसक का पीड़ित मन भी व्याकुल रहता है हर इक पल। पर दुख चुभता ही रहता है अश्रूधार भी रह जाती विफल आँसू से गर पीड़ा मिटती मैं भी सावन भादों-सा रोता खुद की पीड़ा मिट जाने पर सबकी पीड़ा भी हर लाता। तू नितनव पीड़ा रचता तो मैं नव आँसू रचता जाता पीड़ा सबकी हरते हरते सबका प्यारा बन जाता। तब मैं नन्हा बालक बनकर तेरी आँखों में छिप जाता मुझे ढूँढ़ता तू भी रोता Continue reading माँ के आँसू की गरिमा।

शुभमाल छंद “दीन पुकार”

शुभमाल छंद “दीन पुकार” सभी हम दीन। निहायत हीन।। हुए असहाय। नहीं कुछ भाय।। गरीब अमीर। नदी द्वय तीर।। न आपस प्रीत। यही जग रीत।। नहीं सरकार। रही भरतार।। अतीव हताश। दिखे न प्रकाश।। झुकाय निगाह। भरें बस आह।। सहें सब मौन। सुने वह कौन।। सभी दिलदार। हरें कुछ भार।। कृपा कर आज। दिला कछु काज।। मिला कर हाथ। चलें सब साथ।। सही यह मन्त्र। तभी गणतन्त्र।। लक्षण छंद:- “जजा” गण डाल। रचें ‘शुभमाल’।। “जजा” = जगण  जगण ( 121    121 ) ,  दो – दो चरण तुकान्त , 6 वर्ण प्रति चरण बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ तिनसुकिया

सुमति छंद(भारत देश)

सुमति छंद (भारत देश) प्रखर भाल पे हिमगिरि न्यारा। बहत वक्ष पे सुरसरि धारा।। पद पखारता जलनिधि खारा। अनुपमेय भारत यह प्यारा।। यह अनेकता बहुत दिखाये। पर समानता सकल बसाये।। विषम रीत हैं अरु पहनावा। सकल एक हों जब सु-उछावा।। विविध धर्म हैं, अगणित भाषा। पर समस्त की यक अभिलाषा।। प्रगति देश ये कर दिखलाये। सकल विश्व का गुरु बन छाये।। हम विकास के पथ-अनुगामी। सघन राष्ट्र के नित हित-कामी।। ‘नमन’ देश को शत शत देते। प्रगति-वाद के परम चहेते।। लक्षण छंद:- सज “नरानया” गण जब जाते। ‘सुमति’ छंद की लय बिखराते।। “नरानया” = नगण रगण नगण यगण  (111 212 Continue reading सुमति छंद(भारत देश)

मुलाक़ात

शांति बसती है चुपचाप, निहारने में खूबसूरती प्रकृति की | आँखे एक साथ चिपक गई उनकी, जैसे वो जानते हो एक-दूजे को बरसों से | सुंदरता या कृतज्ञता उस लड़की ने पूछा, कोई कैसे सुन्दर हो सकता है , बिना कृतज्ञता के उस लड़के ने बोला | एक की आँखों में आँसू थे, और दूजे के चेहरे पर चमकीली हँसी थी | प्यार या पैसा उस लड़के ने पूछा , ध्यान और स्नेह एैसी, दो चीज़े है जिसकी ना कोई भरपाई बाकी सबके लिए क्रेडिट-कार्ड है  लड़की ने बोला | तब नदी एक महासागर में जा मिली, एक पर्वत ने Continue reading मुलाक़ात

ज्वलंत

कुछ तो होगा उस बन्दे में जिसे लगा है जमाना गिराने में इंसानियत सीखी उसने जब लोगों ने फरियादे माँगी टूटते हुए तारो से और गिरा पेड़ों से जलाकर पूरी तपिश की इन सर्द रातों की

कलमकार

मैं हूँ एक कलमकार, मैं हूँ एक कलमकार | इसका मैनू ना रत्ती भर भी घमंड मिला जब मुझे यह विरसे से लिखना शुरू किया कुछ अरसों से गली का दर्द में वर्सो में देव-दैत्य दोनों मेरे दिमाग में कोलाहल मेरे सामने अखरते ना जाने वो मेरे सवालों से पैसा ले मौज मार मौज मार मत पढ़ इन बवालों में इंसानियत जकड़ी देखी मैंने धर्म की दीवारों में खुश है घरौंदा बनाकर , काँच की मीनारों में नहीं भाते मुझे ये सब क्योकि मैं हूँ एक कलमकार एक छोटा सा कलमकार ना शून्य ना इकाई मैं ब्रह्म की परछाई दोनों Continue reading कलमकार

चाहते हो जिसे टूटकर चाहना

चाहते हो जिसे टूटकर चाहना हाले दिल पर किसी को बताना नहीं . शोख चंचल अदाएँ दिखाकर तुम्हें कोरे मन को तुम्हारे लुभाएँगे हीं ठेस दिल पर लगाएँगे वो बाद में हाँ अभी प्रीत के गीत गाएँगे हीं चेत जाओ अगर चेतना हो जगी ऐरे-गैरों से दिल तुम लगाना नहीं काट ले कोई कीड़ा…. . यूँ हीं चलते चले जो गये तुम तो फिर राह में छूट जाएँगी मंज़िल बहुत मोड़ पर एक ऐसे मिलोगे खड़ा लौटकर आने में होंगी मुश्किल बहुत चाँदनी की चमक में बहक कर कहीं वापसी की डगर भूल जाना नहीं काट ले कोई कीड़ा….. . Continue reading चाहते हो जिसे टूटकर चाहना

मेरे जीवन का हर इक पल …….! (भक्तिगीत)

मेरे जीवन का हर इक पल …….! (भक्तिगीत) मेरे जीवन का हर इक पल, तेरा ही अधिकार, कर ले तू स्वीकार, हे प्रभु, तू ही मेरा आधार……. नाम तेरा मन मन जपता हूँ, ज्ञान तुम्हीसे ही पाता हूँ, काज तेरे करता रहता हूँ , दान तेरा पा खुश रहता हूँ , जो लेता तेरा लेता हूँ , जो देता तेरा देता हूँ कृपा तेरी हो, जीवन मेरा, हो तुझको उपहार, तू ही मेरा आधार ……. प्यार तेरा, मेरा अमृत है, जो भी तू दे, सब स्वीकृत है, इसीलिये दुःख कठिनाई में, मन ना माने हार, तू ही सँवारे भार, तू Continue reading मेरे जीवन का हर इक पल …….! (भक्तिगीत)

कविता अमलताश , रचना -डॉ उमेश चमोला

कविता पीतवर्णी अमलताश पीतवर्णी आभा विखेरता अमलताश मैं उसे निहारता एकटक जैसे उसने मेरे मन की बात पढ़ ली हो , वह बोला मेरे जीवन में ये बहार रातों रात नहीं आई, इस दिन की साल भर से मैं कर रहा था प्रतीक्षा, थर –थर कंपाती शीत लहरी हो, आंधी हो या झंझावत का प्रबल आघात, मैं सब सहता रहा चुपचाप, मैं रहा दृढ और स्थिर चित्त, मुझे पता था ये सब मेरे जीवन में आने वाली बहार को छीन नहीं पायेंगे, मैं यह भी जानता हूँ धन के वहशी रिश्तों और भावनाओं के व्यापारियों के मिथ्यारोपों की आंधी ने Continue reading कविता अमलताश , रचना -डॉ उमेश चमोला

भाग्य और समय का दुष्चक्र

देखो जब किसी को टूटते हुए बिखरते हुए तब चेहरे से मायूस और मन से खुश न होना उपहास मत करना उसके वक्त का न ही स्वांग रचना मिथ्या हमदर्दी का और न ही कोई आडम्बर क्योंकि वक्त और किस्मत कभी सगे होते नहीं किसीके कौन जाने दोनों कब पलट जायें और आपके अंदर की ख़ुशी धरी की धरी रह जाये याद रखना मगर आज उसकी बारी है बारी कल तुम्हारी है किस्मत और वक्त आज तुम्हारे साथ है तो कल उसके साथ भी होंगे बदलेगा प्रारब्ध उसका भी उसका भी मुकद्दर करवट लेगा जो सलूक दोनों ने किया है Continue reading भाग्य और समय का दुष्चक्र

आषाढ़ में कालिदास का पैगाम

आषाढ़ में कालिदास का पैगाम खिड़की से इक विरहन निहारती थी टुकुर-टुकुर उमड़ते-घुमड़ते आवारा मेघों को अचानक उसकी नज़रें रुक गयी बादल के एक टुकड़े पर जमीन पर उतरा है जो अभी-अभी शोख चंचल अंदाज़ उसका बदन से टिप-टिप गिरता पानी किस प्रयोजन से आया है किससे मिलने आया है क्या अपने दिल को ढूंढने आया है या फिर मेघदूत बनकर बादल का वह टुकड़ा विरहन के कानों में उड़ गया कुछ बुदबुदाकर विरहन का चेहरा खिल उठा घूंघट में मल्लिका बन शर्माने लगी कपोलों पर गुलाबी रंग की लहरें अधरों से जैसे मधुरस टपकने लगा शायद बादल का वह Continue reading आषाढ़ में कालिदास का पैगाम

नयनों से निकली मधुशाला

उन नयनों के क्या कहने जहाँ से मधुशाला की नदिया बहती है आंसुओं के मोती समेटकर किसी टूटे हुए दिल का दर्द कहती है शांत रेगिस्तान और चट्टानों से गालों को छूकर कल-कल फिसलती है धीरे-धीरे मधुर धुन में अधरों पर मादक समंदर से मिलती है अधरों के मोहक मंथन से मनचले भंवरों की सांसें महकती हैं सोमरस की मादकता से मदहोश होकर बहारें भी बहकती हैं (किशन नेगी ‘एकांत’ )

बेशुमार कांटे इस डगर

बेशुमार कांटे इस डगर सहज नहीं मंज़िल सुगम नहीं सफर सुलभ नहीं साधन मगर रुकना नहीं कर्मपथ पर चलना है निरंतर बढ़ना है अविरल प्रयास कर सतत मगर डिगना नहीं अग्निपथ पर होना नहीं उदास होना नहीं निराश होना नहीं हताश परचम फहराएगा विजयपथ पर %MCEPASTEBIN%

मुसाफिर ये राह नहीं सुगम ((लघु कविता)

  मुसाफिर ये राह नहीं सुगम ((लघु कविता) राह के मुसाफिर साथ तेरे ये भी पग धरतीबनाले हमसफ़र साथ तेरे चलती जो पौन है राह तुझे ही तलाशनी है अपनी मंज़िल कीतू ही बता यहाँ तेरे सिवा तेरा और कौन है बेइंतिहा बाधायें होंगी पर तू चलना अनवरतबड़ी ज़ालिम ये दुनिया तेरे संघर्ष पर मौन है (एकांत नेगी ‘एकांत’ )