सिर्फ हादसा?

सिर्फ हादसा…? हँसती खेलती एक ज़िन्दगी, शाम ढलते ऑफिस से निकलकर, है दिल्ली की सड़क पर …,, ओवरटाइम से… सुनहरे सपने को जोड़ती, घरपर मोबाइल से कहेती, बस, मम्मी अभी आयी… आज टेक्षीयाँ भी भरी हुई, और…खाली है उसे रुकना नहीं, अपनी फिक्र में दौड़ता शहर, चकाचौंध रौशनी…!! तेजी से एक शैतानी कार थोड़ी रुकी, …और खींचकर उड़ा ले गयी कँवारी हसरतें..मासूमियत… वो जीने की तमन्ना, पीछे सड़क पर पड़ा मोबाइल,पर्स कराहता रहा… चीखे हॉर्न से टकराकर बिखरती रही… सड़क के मोड़ पर ज़िन्दगी को ध्वस्त करके फेंक दिया… थोड़ी ज़ुकी आँखों की भिड़ ने एक ज़िंदा लाश को घर Continue reading सिर्फ हादसा?

उपांतसाक्षी

न जाने क्यूँ….. जाने…. कितने ही पलों का… उपांतसाक्षी हूँ मैं, बस सिर्फ…. तुम ही तुम रहे हो हर पल में, परिदिग्ध हूँ मैं हर उस पल से, चाहूँ भी तो मैं …. खुद को… परित्यक्त नहीं कर सकता, बीते उस पल से। उपांतसाक्षी हूँ मैं…. जाने…. कितने ही दस्तावेजों का… उकेरे हैं जिनपर… अनमने से एकाकी पलों के, कितने ही अभिलेख…. बिखेरे हैं मन के अनगढ़े से आलेख, परिहृत नही मैं पल भर भी… बीते उस पल से। आच्छादित है… ये पल घन बनकर मुझ पर, आवृत है…. ये मेरे मन पर, परिहित हूँ हर पल, जीवन के उपांत Continue reading उपांतसाक्षी

बेसुध सन्नाटा

रात के बेसुध सन्नाटे में मिला न कोई अपना बेचैन आँखें ढूंढ रही थी बचपन का खोया सपना सहमे-सहमे थे सभी पत्ता-पत्ता और बूटा-बूटा धड़कनें भी थक गई थी और दिल भी था टुटा-टूटा सितारे भी डूबे उदासी में चाँद भी था खोया-खोया चांदनी धुंधली पड़ी थी देवदार भी था सोया-सोया मगर पग मेरे रुके नहीं डिगा नहीं कर्म-पथ पर विचलित न हुआ अंगारों से चलता रहा अग्नि-पथ पर क्योंकि छूनी थी मंज़िल चंचल भोर होने से पहले ज्वालामुखी को ललकारा तूफान के रोने से पहले रात के बेसुध सन्नाटे में मिला न कोई अपना बेचैन आँखें ढूंढ रही थी Continue reading बेसुध सन्नाटा

परिवेश

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ उड़ते हों, फिजाओं में भ्रमर, उर में उपज आते हों, भाव उमड़कर, बह जाते हों, आँखो से पिघलकर, रोता हो मन, औरों के दु:ख में टूटकर….. सुखद हो हवाएँ, सहज संवेदनशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ खुलते हों, प्रगति के अवसर, मन में उपजते हो जहाँ, एक ही स्वर, कूक जाते हों, कोयल के आस्वर, गाता हो मन, औरों के सुख में रहकर…… प्रखर हो दिशाएँ, प्रबुद्ध प्रगतिशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ बहती हों, विचार गंगा बनकर, विविध विचारधाराएं, चलती हों मिलकर, रह Continue reading परिवेश

स्मरण

स्मरण फिर भी मुझे, सिर्फ तुम ही रहे हर क्षण में …… मैं कहीं भी तो न था ….! न ही, तुम्हारे संग किसी सिक्त क्षण में, न ही, तुम्हारे रिक्त मन में, न ही, तुम्हारे उजाड़ से सूनेपन में, न ही, तुम्हारे व्यस्त जीवन में, कहीं भी तो न था मैं तुम्हारे तन-बदन में …. स्मरण फिर भी मुझे, सिर्फ तुम ही रहे हर क्षण में …… मैं कहीं भी तो न था ….! न ही, तुम्हारी बदन से आती हवाओं में, न ही, तुम्हारी सदाओं में, न ही, तुम्हारी जुल्फ सी घटाओं में, न ही, तुम्हारी मोहक अदाओं Continue reading स्मरण

मिले जब कोई अजनबी

जिंदगी के अन्तहीन सफ़र में, जब कोई अजनबी मिल जाता है। विरान चमन में न जाने क्यों, एक ताज़ा पुष्प खिल जाता है। तनहाई में सोये अरमानों संग, चुलबुला दिल भी बहल जाता है। अब तो बिना उसकी कल्पना के, जिंदगी का हर पल दहल जाता है। जब वह अपने उष्ण अधरों से, कोमल कपोलों को चूम लेता है। चंचल आषाढ़ की अंगड़ाई में, अधीर चातक भी झूम लेता है। चलते-चलते टेढ़ी-मेढ़ी राह पर, जब कोई चेहरा मिल जाता है। अनायास ही खोया हुआ बचपन, मचल कर फिर से खिल जाता है। जब देखूं चेहरा उस अजनबी का, कोई पराया Continue reading मिले जब कोई अजनबी

मिले जब कोई अजनबी

जिंदगी के अन्तहीन सफ़र में, जब कोई अजनबी मिल जाता है। विरान चमन में न जाने क्यों, एक ताज़ा पुष्प खिल जाता है। तनहाई में सोये अरमानों संग, चुलबुला दिल भी बहल जाता है। अब तो बिना उसकी कल्पना के, जिंदगी का हर पल दहल जाता है। जब वह अपने उष्ण अधरों से, कोमल कपोलों को चूम लेता है। चंचल आषाढ़ की अंगड़ाई में, अधीर चातक भी झूम लेता है। चलते-चलते टेढ़ी-मेढ़ी राह पर, जब कोई चेहरा मिल जाता है। अनायास ही खोया हुआ बचपन, मचल कर फिर से खिल जाता है। जब देखूं चेहरा उस अजनबी का, कोई पराया Continue reading मिले जब कोई अजनबी

बर्फ के फाहे

कुछ फाहे बर्फ की, जमीं पर संसृति की गिरीं…..   व्यथित थी धरा, थी थोड़ी सी थकी, चिलचिलाती धूप में, थोड़ी सी थी तपी, देख ऐसी दुर्दशा, सर्द हवा चल पड़ी, वेदनाओं से कराहती, उर्वर सी ये जमी, सनैः सनैः बर्फ के फाहों से ढक चुकी…..   कुछ बर्फ, सुखी डालियों पर थी जमीं, कुछ फाहे, हरी पत्तियों पर भी रुकी, अवसाद कम गए, साँस थोड़े जम गए, किरण धूप की, कही दूर जा छुपी, व्यथित जमीं, परत दर परत जम चुकी….   यूँ ही व्यथा तभी, भाफ बन कर उड़ी, रूप कई बदल, यूँ बादलों में उभरी, कभी धुआँ, Continue reading बर्फ के फाहे

अनन्त प्रणयिनी

कलकल सी वो निर्झरणी, चिर प्रेयसी, चिर अनुगामिणी, दुखहरनी, सुखदायिनी, भूगामिणी, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… छमछम सी वो नृत्यकला, चिर यौवन, चिर नवीन कला, मोह आवरण सा अन्तर्मन में रमी, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… धवल सी वो चित्रकला, नित नवीन, नित नवरंग ढ़ला, अनन्त काल से, मन को रंग रही, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… निर्बाध सी वो जलधारा, चिर पावन, नित चित हारा, प्रणय की तृष्णा, तृप्त कर रही, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… प्रणय काल सीमा से परे, हो प्रेयसी जन्म जन्मान्तर से, निर्बोध कल्पना में निर्बाध बहती, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… अतृप्त तृष्णा अजन्मी सी, तुम में ही समाहित है ये कही, तृप्ति की Continue reading अनन्त प्रणयिनी

मौत एक सच्चाई

बेशक विज्ञानं ने हर जगह सफलता हासिल की है l मौत और जिंदगी तो ऊपर वाले ने ही लिखी है ll वही होता है और होगा जो ऊपर वाला चाहता हैl बिना उसकी मर्ज़ी के पत्ता भी नहीं हिल पाता है ll किन्तु किस्मत के भरोसे कभी नहीं बैठना चाहिएl हमें जीतने के लिए कोशिशे करते रहना चाहिए ll इंसान अपने कर्मो से ही अपनी किस्मत बनाता हैl मेहनत से तो किस्मत का लिखा भी बदल जाता हैll जिंदगी और मौत तो ऊपर वाले की ही गुलाम है l फिर हम अपने पर क्यों करते इतना गुमान है ll गुमान Continue reading मौत एक सच्चाई

प्रेम सेतु

मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे, जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता। मगर मैंने तो थामा है हाथ तुम्हारा, जिसे मैं कभी छोड़ नहीं सकता। प्रेम बनेगा सेतु हम दो तटों के बीच, जिसे सैलाब भी तोड़ नहीं सकता। तटों के बीच बहती प्रेम धारा को, प्रचंड तूफ़ान भी मोड़ नहीं सकता। मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे, जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता। (किशन नेगी)

आँखें

तुम हो मेरे बता गयी आँखें। चुप रहके भी जता गयी आँखें।। छू गयी किस मासूम अदा से, मोम बना पिघला गयी आँखें। रात के ख़्वाब से हासिल लाली, लब पे बिखर लजा गयी आँखें। बोल चुभे जब काँटे बन के, गम़ में डूबी नहा गयी आँखें। पढ़ एहसास की सारी चिट्ठियाँ, मन ही मन बौरा गयी आँखें। कुछ न भाये तुम बिन साजन, कैसा रोग लगा गयी आँखें।      #श्वेता🍁

यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो चेहरे को आँचल से ढक कर, यूँ टुकुर-टुकुर ना मुझे देखा करो। मेरी आँखों का नूर हो तुम सनम, यूँ गैर बनकर ना मुझे देखा करो। मेरे दिल की धड़कन हो तुम, अजनबी बनकर न धड़का करो। दिल की बात ग़ज़ल में कहती हो, यूँ हर बात पर ना भड़का करो। बनकर हसीं सावन की घटा, यूँ बादलों को ना सताया करो। प्यासे दिलों की धड़कन हो तुम, यूँ गीत विरह का ना गाया करो। दिल की खिड़कियाँ तोड़ कर, यूँ मेरे ख़्वाबों में ना आया करो। दिल की बात दिल को बताकर, यूँ तड़पाकर Continue reading यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

पलाश

काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश… चाहे पुकारता किसी नाम से, रखता नैनों मे इसे हरपल, परसा, टेसू, किंशुक, केसू, पलाश, या प्यार से कहता दरख्तेपल…. दिन बेरंग ये रंगते टेसूओं से, फागुन सी होती ये पवन, होली के रंगों से रंगते उनके गेेसू, अबीर से रंगे होते उनके नयन….. रमते इन त्रिपर्नकों में त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश, नित दिन कर पाता मैं ब्रम्हपूजन, हो जाती नित ये पूजा विशेष….. दर्शन नित्य ही होते त्रित्व के, होता व्याधियों का अंत, जलते ये अवगुण अग्निज्वाला में, नित दिन होता मौसम बसंत…. काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश… —————————- Continue reading पलाश

गज़ल

भरोसा किया था जिन पर, वही आज पराये हो गए, अपने ही क़दमों के निशान, न जाने कहाँ खो गए | मिटाने चले थे हस्ती हमारी, मगर खुद ही मिट गए, अपनी ही सजाई महफिल में, ज़नाब खुद ही पिट गए| कदम जो पड़े उनके मयखाने में, शराब बरसने लगी, आँखों से उनकी पीने को, आज ग़ज़ल भी तरसने लगी। चल कर तेरी महफ़िल में, आज खुद शबाब आया है, एक हाथ में ग़ज़ल और एक हाथ में शराब लाया है। वो आयी जब मेरी मज़ार पर, मुर्दे भी मचलने लगे, बिजली लगी चमकने, दीवाने बादल भी गरजने लगे। दीवानों Continue reading गज़ल