ढूंढता रहा जिसे पा न सकूँ,

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ, खबर नहीं जिसकी, मिल गयी। हवा ने उठाया, घूँघट चाँद का, रात में चांदनी जैसे, खिल गयी। मैंने माँगा था, फ़क़त हाथ उसका, थमाकर वह कम्वख्त, दिल गयी। कदम उसके पड़े, मेरी गली में, जमीं मेरे खाबों की, हिल गयी। पहले उधेड़ी उसने, ज़िन्दगी मेरी, फिर मेरी ही खाल से, सिल गयी। (किशन नेगी ‘एकांत’ )

वो कोई और न

वो तूफानी रात मचलती शीत लहर धुंधली चादर लपेटे चेतनाशून्य में डूबा रात का सन्नाटा ख़ामोशी करती पहरेदारी ऐसी संवेदन-शून्य वीरानी रात में चला जा रहा था कोई अपनी डगर जैसे भूल गया हो मंज़िल अपनी फकत किसी परछाई का अहसाह था अकस्मात गुजरा एक वाहन उसी पथ से जिस पथ थी वह सहमी परछाई अनजान चेहरा कोई उतरा उस वाहन से, देख उस परछाई को शायद इरादे भी नेक नहीं लगा करने कुछ इशारे भद्दे, हरकतें अश्लील चेहरा कामातुर भाव लिए परछाई डरी-डरी, सहमी-सी क़दमों की रफ़्तार तेज कर दौड़ी जा रही थी, ढूंढने कोना कोई सुरक्षित कभी चिल्लाती Continue reading वो कोई और न

कल मैं रहूँ ना रहूँ

(यह कविता शिक्षक दिवस की पावन बेला पर एक शिक्षक, जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है, की ओर से अपने मासूम शिष्यों को समर्पित) कल मैं रहूँ ना रहूँ मगर रहेंगी वो मधुर यादें, वो सुनहरे पल जो बिताये थे मैंने संग तुम्हारे चाँद सितारों से भी आगे तुमको अभी और जाना है लक्ष्य छुपा हो कहीं भी तुम्हारा हर हाल में उसे पाना है रुकना नहीं, भटकना नहीं तुम यूँ हीं निरंतर पग धरते रहना कल मैं रहूँ ना रहूँ फिसलती है जैसे रेत मुट्ठी से वक्त को ना कभी फिसलने देना ख्वाबों को अपने रखना संजोकर Continue reading कल मैं रहूँ ना रहूँ

रिश्ता कच्चे धागों का

रिश्ता कच्चे धागों का बाँध दिया रक्षा सूत्र भैया सुनी नहीं है कलाई आज बहना को जो दिया वचन भैया रखना उसकी लाज मेरे भैया पर मुझे है नाज़ दो ताली बजाओ साज झूमो, नाचो, गाओ आज फिर करेंगे मिलकर काज भैया करता रहे मेरा राज देती हूँ दुआ दिल से आज निर्भय हो करता रहे काज जय हो भैया कहे समाज कवि राजेश पुरोहित

फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा

२ दिनों का देश प्रेम फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा.. चलो कुछ दिन बाद फिर से स्वतंत्रता दिवस आएगा.. २६ जनवरी की शाम को बंद कर के जहा रखा था झंडा, उन डब्बो से धूल हटाया जाएगा .. साल में २ दिन ही सही पर वो तिरंगा फिर से बाहर निकाला जाएगा.. जब हर चौक चौराहे पर तिरंगा फेहराया जाएगा फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा.. चलो कुछ दिन बाद फिर से स्वतंत्रता दिवस आएगा.. बड़-चढ़ कर फेसबुक-व्हाट्सप्प पर पोस्ट लगाया जाएगा.. फिर से एक दिन देश के नाम राष्ट्रगान गया Continue reading फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है।   गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है।   याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है।   मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है।   पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है।   पंख फैलाये थे जिस ममता के आँगन में आज वहीं पर Continue reading आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को कर गया वो पराया अपने घरों को।   कहाँ तक उड़े चले जाते हैं देखें आस्मां मिला है टूटे हुए परों को।   बहा है लहू किसके सरों का, देखो उठाकर फेंके हुए इन पत्थरों को।   क्या पता कि वोह सोया भी था कि नहीं छोड़ गया है वो गूँगे बिस्तरों को।   बहुत लहूलुहान हो गया है बिचारा समझाये कोई तो अब ठोकरों को।   ये कलियाँ शबनम भरी सिसकती रहीं कहीं काँटे ना चुभ जायें भ्रमरों को।   वोह मुस्कान तेरे लबों को छूकर चूम चूम जाती है मेरे अधरों को।                    …. Continue reading बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को बिखर भी जाने दो महकते गजरों को।   नशा पीने में नहीं, पिलाने में भी है गौर से तो देख, साकी की नजरों में।   हादसा था वोह नाजुक से प्यार का पर दहला गया है सारे शहरों को।   कातिल न था वो बस रखने आया था मेरे सीने में अपने खंजरों को।   लजा जाता है अक्स भी आईने का झुका लेता है वो अपनी नजरों को।   लौट आने की चाहत में अपने घर खड़खड़ाता रहा वो तमाम घरों को।   उठी थी इक चिन्गारी दमन की मगर जलाती गई Continue reading महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं हम इसे साये-मौत की दिल्लगी कहते हैं।   ये छलकते जाम भी इक साज से होते हैं हम प्यासे इसे महकती बंदगी कहते हैं।   इस घर के सामने बेघरों की जो भीड़ है वे ही इसके मलबे को गंदगी कहते हैं।   ये चिथड़ा कमीज, ये फटी नीकर कुछ तो है इस गरीबी को लोग तो सादगी कहते हैं।   बासी रोटी से उठती भूख की खश्बू को गरीब बच्चे बेचारे ताजगी कहते हैं।   गरीब की झोपड़ी जलाकर खाक कर देना हरेक मजहब इसी को दरिंदगी कहते हैं। ……    भूपेन्द्र Continue reading लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

एक बेनाम रिश्ता

एक बेनाम रिश्ता : हमारी लाइफ में कुछ ऐसी stories होती है, जिसे हम किसी से कह नहीं पाते, लेकिन उनका हमारी लाइफ में एक impact होता है.. कुछ ऐसे गुमनाम से रिश्ते जिसे हम छोड़ना नहीं चाहते और ना उनके साथ आगे बड़ सकते है, वही सब कुछ बयां करती कुछ पंक्तिया : ” एक बेनाम रिश्ता “ एक अजनबी अनजाना सा रिश्ता होता है, जिसे हम हर किसी को चंद शब्दों में बता नहीं सकते, हम तो समझते है पर किसी को समझा नहीं सकते, लगता है कौन समझेगा हमारी इन बातो को, रात के अँधेरे में सबसे Continue reading एक बेनाम रिश्ता

आधी जिंदगी

आधी जिंदगी जिंदगी कुछ नहीं है और, ये तो है एक कच्ची डोर | कोई साथी नहीं साथ का , इस आने और जाने की राह का | जिंदगी से तुम करो न प्यार , क्यूकी ये तो है एक बेवफा यार |

मुहब्बत करने वाले

*मुहब्बत करने वाले * खैर तुझसे मुहब्बत करने वाले तो हरदम निकले , पर तुझ पर मर मिटने वाले ही बहुत कम निकले || संभाला था सदा तेरे आब-ए-तल्ख़ को जिसने , अफ़सोस उसके हिस्से में सिर्फ गम ही गम निकले || सौपी थी कोरा कागज जिनको लिखने को तकदीर , ऐन वक्त पर वे सब बिन स्याही के कलम निकले || तेरे चाहने वालो की लम्बी थी कतार जगत में पर , सही मायने में तुझे चाहने वाले तो सिर्फ हम निकले ||

मेने वक़्त बदलते देखा है !!

मेने वक़्त बदलते देखा है ! मेने तूफानों को साहिलो पर ठहरते देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है.. मेने दिन के उजालो को, रात के अँधेरे में बदलते देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है.. मेने हर दिल अजीज़ लोगो को भी, एक पलभर में बिछड़ते हुए देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखा है.. चंद रुपयों के लालच में, अपनों को अपनों से झगड़ते हुए देखा है.. हाँ मेने वक़्त को बदलते हुए देखे है.. एक सत्ता की कुर्सी के आगे, अच्छे अच्छों का ईमान सड़क पर बिकते हुए देखा Continue reading मेने वक़्त बदलते देखा है !!

चुनावी जंग

चुनावी जंग आ गया चुनाव ,शुरू हुई चुनावी जंग सियासत में दिखने लगे हज़ारों रंग दल बदलू भी आ गए देखो संग- संग इनको न लड़ना कोई,अब सियासी जंग बड़े दल देख कर , हुए सभी अब दंग इनके काम काज का , है अनोखा ढंग योजनाओं से जोड़, खूब बजाते चंग पुरोहित नहा लिए,बहती है नित गंग कवि राजेश पुरोहित

मन की सुंदरता

हर चेहरे के पीछे ,एक चेहरा छुपा होता है l जैसा जो दिखता है वो वैसा नहीं होता है ll ये आँखे भी कई बार धोखा खा जाती है l जब चेहरे का दूसरा रुख पढ़ नहीं पाती है ll हम जैसा सोचे वैसा हो ये तो जरुरी नहीं l हर चमकती चीज़ सोना हो ये भी तो नहीं ll किसी रूप को देखकर धोखा मत खा जाना l पहले चेहरे के पीछे,छिपे चेहरे को पहचानना ll किसी को उसके रूप से नहीं गुण से जानो l रूप से ज्यादा मन की सुंदरता को पहचानो ll रूप तो छलावा है Continue reading मन की सुंदरता