अगर तुम ना होते मेरे पति (हास्य-व्यंग)

रसोई में बजाकर बर्तन सुबह-सुबह पत्नी झल्लाई अपने वफ़ादार दुल्हे पर चादर ताने देखते हो ख़्वाब पड़ोसन के और जलते हैं इधर ख़्वाब मेरे चूल्हे पर होती अर्धांगिनी अगर किसी राक्षस की शायद कभी ना होती मैं इतनी परेशान किस कर्मजले पंडित ने मिलाई कुंडली जो ढूंढ कर मिला तुम जैसा पति शैतान पति सकुचाया, फिर मुस्कराकर बोला भली हो तुम जैसे कश्मीर की वादी राक्षस को कैसे तुम वरमाला पहनाती जानू, खून के रिश्ते में नहीं होती शादी अगर होती तुम सुहागन राक्षस की सदैव कहलाती तुम उसकी दानवी काश, ये सपना अगर सच हो जाता मेरे ख़्वाबों में Continue reading अगर तुम ना होते मेरे पति (हास्य-व्यंग)

ये शाम कितनी मदहोश है

मखमली धुमिल चादर लपेटे ये शाम कितनी मस्तानी है मंथर गति से ढलता सूरज दस्तक देती रात की रानी है उन्माद में डूबा है नभमण्डल जैसे फैलाकर पंख असमानी धीमे पग धर बटोही चला है गठरी में बांधे ख्वाब अरमानी ले चुम्बन धान की बालियों का हवा गीत कोई गुनगुनाती है खेत किनारे थिरकती पीपल बांसुरी लिए राग एक सुनाती है ढलते सूरज की चंचल किरणें कुछ उदास, कुछ ग़मगीन हैं थकी-सी अनजान परछाईयाँ कदमों की आहट नमकीन हैं मंदिर की घंटी की धुन संग शाम ठुमक-ठुमक ढलती है पायल की झंकार थिरक कर ठंडी आहें भर कर चलती है Continue reading ये शाम कितनी मदहोश है

पुस्तक समीक्षा

विषय:- पुस्तक समीक्षा कृति:- दीपक तले उजाला कवयित्री:- उर्मिला श्रीवास्तव पृष्ठ:-94 मूल्य:-100/- समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित” लखनऊ की कवयित्री उर्मिला श्रीवास्तव की यह आंठवी कृति “दीपक तले उजाला” पढ़ी। इस कृति की सभी कविताएँ मानव को कुछ न कुछ सीख देती है। इस कृति की पहली काव्य रचना चार घड़ी है। यह जीवन क्षण भंगुर है। जीवन कब तक है किसी को पता नहीं। यह सच्चाई हमेशा याद रहे। ये मानव तन मिलना दुर्लभ है। यदि मिला है तो इसमें अच्छे कर्म करें। बदला,अनकही ,खुद सर,36 की गिनती जैसी रचनाओं से श्रीवास्तव ने जीवन की अच्छाइयों को बताने का प्रयास Continue reading पुस्तक समीक्षा

दोहे

राजस्थानी दोहे चौमासो बरसो घणो, साजण याद सताय। एक पल भी जुग लागे,बरसे रिमझिम हाय।। काळी काळी बादली,आसमान पर छाय। घर घर करती हे घटा, तू धरती पर आय।। होरी खेल रही सखी,रंग मलमल लगाय। फागण में भींगे घणी, मनड़ो भी हरसाय।। बिजुरी चमके बावरी, हिवड़ो भी शरमाय। बादल बरसे जोर सूं, पिया मिलन की आय।। टाबर सगळा देख के,जीव में जीव आय। खेलण में बिसरा न दे, हिवड़ा बैठे छाय।। महँगाई ने कर दी, देखो नींद खराब। सुरसा सी बढ़ती जाय, चले सियासी दाव।। करसान बैठ रो रिया, देख राजनीत को खेल। योजना कागज़ में छे,बढतो जावे मेल।। कवि Continue reading दोहे

इश्क के बाज़ार में

इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार   अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों धोता है नादानी में जिसे तू, मुहब्बत समझ बैठा था है ये वही गुनाह, जिसे आज तू ढोता है   गुनाह नहीं था कोई, हाथ की लकीरों का नतीजा तो वही होता है, जो कर्म होता है काँटों से खुशबू की, चाहत न रखना कभी कल वही उगेगा फिर, जो आज तू बोता है दस्तक देने आयी थी, किस्मत तेरे द्वार पर रुठ कर चली गयी, चादर ताने क्यों सोता है इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों Continue reading इश्क के बाज़ार में

कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

अपने सुहाग से चंचल सुहागन बोली आज पड़ोसन के यहाँ राम कथा थी पंडित पांडे जी ने कहा रामराज्य में ना कोई दुःख था, ना कोई व्यथा थी  रामराज्य में शेर-बकरी भी जानू बेफिक्र पीते पानी एक ही घाट पर संभव ये कैसे, हमने तो नहीं काटी अब तक कोई रात एक ही खाट पर  व्यंग-वाणों से घायल पति बोला संभव ये कैसे नहीं हो सकता है जब मैंने काटी ज़िन्दगी बन बकरी तो यह किस्सा भी सच हो सकता है  ये सुनकर पत्नी फूली ना समायी फिर खो गयी अपने ही साम्राज्य में जब यह घटित हो सकता है Continue reading कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

अभी तो पहला ज़ाम है (पति-पत्नी नोंक-झोंक)

   इक नयी नवेली दुल्हन ने दुलारे पति को फोन किया प्यारे जानू घर कब आओगे मुझे इतनी जल्दी भुला दिया पलट कर बेचारा पति बोला प्यारी बस लेता हूँ तेरा नाम बेसब्री झेल लो कुछ पल और यहाँ लगा है जाम पर जाम झल्ला कर पत्नी चिल्लाई घर कब तक पहुंचोगे कब ख़त्म होगा ये जाम क्या यहीं पर जमे रहोगे होकर मदहोश पति बोला प्रिये क्या नशीली शाम है तनिक धैर्य धरो गजगामिनी अभी तो बस पहला जाम है (किशन नेगी ‘एकांत’ )

चले दूल्हे राजा (पति-पत्नी नोंक-झोंक)

अपनी ख़्वाबों की रानी को पत्नी बनाने चले दूल्हे राजा असुरों की बारात संग लिए संग में है बेसुरा बैंड-बाजा लेकिन पता चला जब उसको दहेज़ में ससुर देता है बाइक लौटा दी बारात उसने क्योंकि पेट्रोल के दाम हो गए हाइक ख़बर ये सुन, वरमाला पकड़े दुल्हन पड़ी थी कोने में बेहोश कोस रही थी निष्ठुर पेट्रोल को क्या आज ही होना था मदहोश (किशन नेगी ‘एकांत’ )

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ,

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ, खबर नहीं जिसकी, मिल गयी। हवा ने उठाया, घूँघट चाँद का, रात में चांदनी जैसे, खिल गयी। मैंने माँगा था, फ़क़त हाथ उसका, थमाकर वह कम्वख्त, दिल गयी। कदम उसके पड़े, मेरी गली में, जमीं मेरे खाबों की, हिल गयी। पहले उधेड़ी उसने, ज़िन्दगी मेरी, फिर मेरी ही खाल से, सिल गयी। (किशन नेगी ‘एकांत’ )

वो कोई और नहीं

वो तूफानी रात मचलती शीत लहर धुंधली चादर लपेटे चेतनाशून्य में डूबा रात का सन्नाटा ख़ामोशी करती पहरेदारी ऐसी संवेदन-शून्य वीरानी रात में चला जा रहा था कोई अपनी डगर जैसे भूल गया हो मंज़िल अपनी फकत किसी परछाई का अहसाह था अकस्मात गुजरा एक वाहन उसी पथ से जिस पथ थी वह सहमी परछाई अनजान चेहरा कोई उतरा उस वाहन से, देख उस परछाई को शायद इरादे भी नेक नहीं लगा करने कुछ इशारे भद्दे, हरकतें अश्लील चेहरा कामातुर भाव लिए परछाई डरी-डरी, सहमी-सी क़दमों की रफ़्तार तेज कर दौड़ी जा रही थी, ढूंढने कोना कोई सुरक्षित कभी चिल्लाती Continue reading वो कोई और नहीं

कल मैं रहूँ ना रहूँ

(यह कविता शिक्षक दिवस की पावन बेला पर एक शिक्षक, जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है, की ओर से अपने मासूम शिष्यों को समर्पित) कल मैं रहूँ ना रहूँ मगर रहेंगी वो मधुर यादें, वो सुनहरे पल जो बिताये थे मैंने संग तुम्हारे चाँद सितारों से भी आगे तुमको अभी और जाना है लक्ष्य छुपा हो कहीं भी तुम्हारा हर हाल में उसे पाना है रुकना नहीं, भटकना नहीं तुम यूँ हीं निरंतर पग धरते रहना कल मैं रहूँ ना रहूँ फिसलती है जैसे रेत मुट्ठी से वक्त को ना कभी फिसलने देना ख्वाबों को अपने रखना संजोकर Continue reading कल मैं रहूँ ना रहूँ

रिश्ता कच्चे धागों का

रिश्ता कच्चे धागों का बाँध दिया रक्षा सूत्र भैया सुनी नहीं है कलाई आज बहना को जो दिया वचन भैया रखना उसकी लाज मेरे भैया पर मुझे है नाज़ दो ताली बजाओ साज झूमो, नाचो, गाओ आज फिर करेंगे मिलकर काज भैया करता रहे मेरा राज देती हूँ दुआ दिल से आज निर्भय हो करता रहे काज जय हो भैया कहे समाज कवि राजेश पुरोहित

फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा

२ दिनों का देश प्रेम फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा.. चलो कुछ दिन बाद फिर से स्वतंत्रता दिवस आएगा.. २६ जनवरी की शाम को बंद कर के जहा रखा था झंडा, उन डब्बो से धूल हटाया जाएगा .. साल में २ दिन ही सही पर वो तिरंगा फिर से बाहर निकाला जाएगा.. जब हर चौक चौराहे पर तिरंगा फेहराया जाएगा फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा.. चलो कुछ दिन बाद फिर से स्वतंत्रता दिवस आएगा.. बड़-चढ़ कर फेसबुक-व्हाट्सप्प पर पोस्ट लगाया जाएगा.. फिर से एक दिन देश के नाम राष्ट्रगान गया Continue reading फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है।   गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है।   याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है।   मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है।   पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है।   पंख फैलाये थे जिस ममता के आँगन में आज वहीं पर Continue reading आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को कर गया वो पराया अपने घरों को।   कहाँ तक उड़े चले जाते हैं देखें आस्मां मिला है टूटे हुए परों को।   बहा है लहू किसके सरों का, देखो उठाकर फेंके हुए इन पत्थरों को।   क्या पता कि वोह सोया भी था कि नहीं छोड़ गया है वो गूँगे बिस्तरों को।   बहुत लहूलुहान हो गया है बिचारा समझाये कोई तो अब ठोकरों को।   ये कलियाँ शबनम भरी सिसकती रहीं कहीं काँटे ना चुभ जायें भ्रमरों को।   वोह मुस्कान तेरे लबों को छूकर चूम चूम जाती है मेरे अधरों को।                    …. Continue reading बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को