गुफ़्तगू हो गई ख्वाब से

सजी महफ़िल ख़्वाबों की, चांदनी रात के आँचल तले। इसी आँचल ने पाला इनको, इसकी छाँव में ही पले। संगीत की मादकता में, उधर ख्वाब थिरक रहे थे। आबशार बनकर बा-दस्तूर, इधर पैमाने छलक रहे थे। ख़ामोशी थी चिर निद्रा में, मदहोशी का था आलम। कोई किसी की प्रियतमा, कोई किसी का था बालम। थिरक रहा था मैं भी, पकड़ कर हाथ में प्याला। ख़्वाबों में भी ना देखी, ऐसी उन्मत्त मधुशाला। पूछा मैंने एक ख्वाब से, क्या देखा है कभी ख्वाब? मुस्कुराकर उसने दिया, मेरे कौतुक प्रश्न का ज़वाब। देखते नहीं हम ख्वाब कभी, ख्वाब दिखाते हैं इंसानों को। Continue reading गुफ़्तगू हो गई ख्वाब से

गिरने का जमाना है आया।

गिरने का देखो जमाना हि आया। शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा हैं । समझता था ऊपर चढे वो है गिरते मगर जो है नीचे वही गिर रहे हैं । क्या बात है सच का साथी रहा जो वही घिर रहा है सही घिर रहा है । गिराने की ख्वाहिश रही दिल में जिसके मुझे तो गिराने में खुद गिर रहे है । गिरने का देखो जमाना हि आया। शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा हैं । कहीं पर चढ़ा भाव आलू के देखो कहीं प्याज उछली नभ छू रही है । मगर यह भी देखा भाव भारी Continue reading गिरने का जमाना है आया।

विन्ध्य प्रकाश मिश्र विप्र की कविता

गिरने का देखो जमाना हि आया। शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा हैं । समझता था ऊपर चढे वो है गिरते मगर जो है नीचे वही गिर रहे हैं । क्या बात है सच का साथी रहा जो वही घिर रहा है सही घिर रहा है । गिराने की ख्वाहिश रही दिल में जिसके मुझे तो गिराने में खुद गिर रहे है । गिरने का देखो जमाना हि आया। शेयर गिर रहा है हेयर गिर रहा हैं । कहीं पर चढ़ा भाव आलू के देखो कहीं प्याज उछली नभ छू रही है । मगर यह भी देखा भाव भारी Continue reading विन्ध्य प्रकाश मिश्र विप्र की कविता

चाँद सितारों से रात सजा रखी है

चाँद सितारों से रात सजा रखी है चाँद सितारों से रात सजा रखी है जमीं पे मखमली दूब सजा रखी है। बता, ये दुनिया क्यूँकर सजा रखी है वो बोला, तेरे लिये सजा रखी है। … भूपेन्द्र कुमार दवे

तुमने अपनी दुनिया सजा रखी है

तुमने अपनी दुनिया सजा रखी है    तुमने अपनी दुनिया सजा रखी है भ्रमरों की मस्त महफिल बुला रखी है पर तुमने मुझे तन्हा रहने न दिया कुछ याद अपनी मेरे लिये सजा रखी है।                                  … भूपेन्द्र कुमार दवे               00000

विन्ध्य प्रकाश मिश्र विप्र की कविता

विन्ध्य प्रकाश मिश्र विप्र की कविता *शब्द ताकत है शब्द दुआ है *शब्द घातक है शब्द दवा है *शब्द वेद है शब्द कुरान है *शब्द बाइबिल शब्द पुरान है शब्द अल्लाह शब्द भगवान है शब्द उपदेश शब्द गीत गान है शब्द मे समाहित आस्था महान है शब्द मंत्र शब्द फरमान है शब्द पूजा है शब्द अजान है शब्द बडाई है शब्द सम्मान है शब्द गीत है शब्द तान है शब्द ही अंधे का भान है शब्द अधिगम की जान है शब्द से होता मानव की पहचान है सबको इसका संज्ञान है। शब्द शक्ति है शब्द ही ज्ञान है शब्द कवि Continue reading विन्ध्य प्रकाश मिश्र विप्र की कविता

कवि के अमर शब्द

रात का अँधेरा, पसरा हुआ सन्नाटा जंगल के सभी प्राणी निःशब्द अँधेरे सन्नाटे में कोई घायल परछाई भागी जा रही है किसी अज्ञात दिशा की ओर हाथों में कुछ पन्नों के टुकड़े, माथे से बहता लहू शायद यह घायल परछाई किसी कवि की है ढूंढ रहा है जो एक सुरक्षित कोना, अपनी कविता की आत्मा को जिन्दा रखने के लिए दिखाई देती है तभी उसे एक निर्जन व वीरान गुफा गुफा भी उसकी दशा देख, देती है उसे शरण तभी कुछ धुंधली परछाइयाँ, हाथों में मशाल थामे ढूंढ रही हैं उसे, कुछ हाथों में नुकीले पत्थर हैं तो कुछ हाथों Continue reading कवि के अमर शब्द

क्षणिक आसक्ति

जब से देखा है तुझे इन नयनों ने न जाने क्यों दिल में कुछ-कुछ होने लगा है रात की निंदिया किसी ने चुरा ली है दिन का चैन कहीं खो-सा गया है जब से देखा है तुझे इन नयनों ने न जाने क्यों मासूम दिल की धड़कनें बेचैन हैं नटखट मन लगा है भटकने नाजुक सांसें भी ठंडी आहें भरने लगी हैं जब से देखा है तुझे इन नयनों ने न जाने क्यों लज्जायी पलकें झपकना भूल गई हैं नयनों के आसूं जैसे जम गए हैं मुरझाई कलियाँ खिलने लगी हैं सपने नील गगन को चूमने लगे हैं नई अभिलाषाओं Continue reading क्षणिक आसक्ति

तो मैं क्या करूँ (ग़ज़ल )

बेवफाई की सोहबत रास आयी, तो मैं क्या करूँ? देखा अंजाम अगर सारे शहर ने, तो मैं क्या करूँ? लाख किया था मना, कभी ना करना मोहब्बत, जब दिल के टुकड़े हुए हज़ार, तो मैं क्या करूँ? मोहब्बत की राहों में, काँटों के सिवा कुछ नहीं फूलों की चाहत रखोगी दिल में, तो मैं क्या करूँ? मैंने तो की थी इबादत, तुझे खुदा समझ कर, तू ही अपना फ़र्ज़ भूल जाए, तो मैं क्या करूँ? आये थे तेरी महफ़िल में, तेरे दिदार को हम, मेहताब छुपा था नक़ाब में, तो मैं क्या करूँ? अब्र को भेजा था पैयाम, खूब बरसना Continue reading तो मैं क्या करूँ (ग़ज़ल )

कर्ज

नीले सागर की उन्मादी लहरों पर लिखूं कोई प्रेम कविता आज, अपनी नशीली आखों से, कुछ रोशनाई उधार दे दो मुझे। शब्द हो जायें अमर मेरे, घुल कर तेरे माधुर्य में, अपने रसीले अधरों से, कुछ मधु रस उधार दे दो मुझे। तुम्हारे मखमली कपोलों के सरोवर में, तैरता है जो धवल कोरा कागज, करूँ उस पर उत्कीर्ण मन के भाव. कुछ जमीन उधार दे दो मुझे। दुनिया के शब्द बाणों से घायल, क्षणिक विश्राम चाहिए कविता को, अपनी जुल्फों की शीतल छाँव में. कुछ एकाकी पल उधार दे दो मुझे। बिछुड़ गए थे जो स्वर्णिम पल, हमारे रुपहले अतीत Continue reading कर्ज

ग़ज़ल

आंखों का काजल आंखों के काजल की महिमा बडी महान। लाखों घायल हुए और ले ली कितनी जान।। युवाओं में लगा दी जिस गाने ने आग। आंखों का वो काजल सबने रखा ध्यान।। इंटरनेट पर मग्न है भीड़ युवाओं की इस साल। काजल के पीछे पड़ा विद्वानों का सारा ज्ञान।। आंखों में बसाता कोई आंखों से बतियाता। आंखों के काजल में रहता न कोई भान।। आँखे पल पल देखती दुनियाँ की टेढ़ी चाल। काजल लगाकर बढ़ा रहे सारे अपनी शान।। कवि राजेश पुरोहित श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी पिन 326502 मोबाइल 7073318074

कविताएँ

आर्य संस्कृति बन सन्यासी देश जगाया युवाओं को जिसने जगाया व्यर्थ सारे जग के आडम्बर सत्य राह पर जिसने चलाया भारत की आर्य संस्कृति को सारे जग को जिसने बताया वह युवा सन्यासी प्रखर वक्ता जिसने मानव धर्म सिखाया शिकांगों के धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म का परचम लहराया विश्व गुरु भारत केवल अपना जहाँ का पत्थर भी पूजवाया आस्था भाईचारे की मिसाल आर्यावर्त ने सारा जग महकाया वंदे मातरम नारे को अपनाया सच पूछो भारत वही कहाया कवि राजेश पुरोहित श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी पिन 326502 ************************ : अदम्य साहस प्रखर तेज दयानंद सा अब युवाओं में कहाँ है देश Continue reading कविताएँ

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ l बेटी हमारा अभिमान है l जीने का हक़ इनको भी है l इनमे भी तो, जान है ll दो सामान अधिकार बेटी को l ना कोई भेदभाव करो l अच्छी शिक्षा देकर इनको l इनके पैरो पर खड़ा करो ll बेटियाँ है हर क्षेत्र में आगे l आज नहीं बेटो से कम l न हो कन्या भ्रूण हत्या l आओ प्रण ले, आज हम ll बेटा-बेटी एक समान है l दोनों को दे प्यार हम l माँ ,बहन का रूप है बेटी l इनको दे सम्मान हम ll माँ ,बहन का रूप है बेटी l Continue reading बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

चहकने लगी शराब (ग़ज़ल)

जब से मिली तेरी सोहबत, चहकने लगी शराब, देख तेरी परवाज़ अब्र में, चहकने लगी शराब। फ़लक से जो उतरा शबाब, चमन-ए-दहर में, पाकीज़ा खुशबु से उसकी, महकने लगी शराब। तेरी शोखियाँ से मुत्तासिर, पैमाने छलक गए, जाम ने जो छुआ होठों को, बहकने लगी शराब। जल रही थी चिंगारियां जब, दो दिलों के दरमियाँ, चिंगारी एक यहाँ भी गिरी, दहकने लगी शराब। बड़े बेआबरू होकर, तेरे मयखाने से जो निकले, सितारों को देख गर्दिश में, सिसकने लगी शराब। महताब की तबस्सुम पे, इतना मत इतरा ‘ एकांत, गुफ्तगू जो हुई आफ़ताब से, मचलने लगी शराब। (किशन नेगी ‘एकांत’)

ग़ज़ल (तड़पता है दिल यहां)

नज़ाकत देख तेरी शोखियाँ की , मचलता है दिल यहाँ नादान्स्तिा में करके मोहब्बत, मचलता है दिल यहाँ मेरे इख़्तियार में ना था, चाँद हो मेरे आगोश में, तड़पता है महताब वहां, तड़पता है दिल यहां। एक आशना की जुस्तुजू में, गुजर गई एक हयात, बिजली कड़की आकाश में, कड़कता है दिल यहां। ख़लिश है दिल में आज भी, खामोश क्यों रहा, तू धड़कती है वहां, और धड़कता है दिल यहां। क़ासिद बना इख्लास का, ये मुहाजिर तेरे शहर में, फड़कती है तू वहां, और फड़कता है दिल यहां। इन्तिक़ाम की आग में, उठता है धुआं ‘एकांत‘, वो दहकती है Continue reading ग़ज़ल (तड़पता है दिल यहां)