आलौकिक शक्ति

कोई तो शक्ति है इस ब्रह्माण्ड में l जो किसी को नज़र नहीं आती l किन्तु किसी न किसी रूप में l अपने होने का आभास कराती ll कैसे एक माँ की कोख में l शरीर के अंग बन जाते है ? आँख ,नाक सब एक से l चेहरे अलग नज़र आते है ? कैसे सूरज की दस्तक से l ये अंधकार मिट जाता है? चंदा मामा के आते ही l सूरज कहाँ छिप जाता है ? सांसो की डोरी जब टूटती l कैसे शरीर ढेर हो जाता है ? कहाँ चली जाती वो सांसे l कोई समझ नहीं पाता Continue reading आलौकिक शक्ति

मन का बोझ

सुनाता हू दास्ताँ उन्हें अपना समझकर l अनसुना कर देते है पागल समझकर ll नहीं कहता तो दिल परेशान हो जाता है l कहता हू क्योकि मन हल्का हो जाता हैll कहते है अपने तो अपने होते है l परायो में भी अपने छिपे होते है ll कभी अपने भी दगा दे जाते है l कभी पराये साथ निभा जाते है ll कैसो हो पहचान समझ न पाया l कौन है अपना यहाँ कौन पराया ll मन पर बोझ नहीं रखा जाता l सो  अपना समझ,दुःख बताता ll जो दुःख आना है वो जरूर आएगा l बस कह सुनकर कम हो Continue reading मन का बोझ

अब इतना उनको याद न कर

जिंदगी यू बरबाद न कर … जो भूल गए तुझे…. भूल तू उनको इतना उनको याद न कर॥ वो दोस्त न थे न साथी थे … तेरे बस हमराही थे … तू उनको भूल के आगे बड़ … जो वक़्त गया उसे जाने दे… अब सोच के पल बरबाद न कर॥ क्यो सोचता है तू बाते उसकी फिकर तू उसकी छोड़ दे वो कहती है ना नफरत है… मायूस ना हो तेरी किस्मत है॥ खामोश ना रह नादान वो पागल… जो हुआ उसे अब जाने दे तू उनको भूल के आगे बढ़ अब वादो पर विश्वास ना कर… अब इतना Continue reading अब इतना उनको याद न कर

मन के झूठे मै ख्वाब लिखूँ

कुछ बात लिखूँ जज़्बात लिखूँ या मन के झूठे मै ख्वाब लिखूँ मै लिख तो दु सब बाते तेरी… पर लिखूँ तो क्या बात लिखूँ तू भूल गयी तो भूल गयी जा तेरी मै क्यो बात लिखूँ…   टूटे अपने अरमान लिखूँ या तेरा झूठा वाला प्यार लिखूँ मै अपने मन के घाव लिखूँ या दिल के अपने हाल लिखूँ अभी धूप लिखूँ की छाव लिखूँ या खूब अंधेरी रात लिखूँ. ॥     कुछ बात लिखूँ जज़्बात लिखूँ या मन के झूठे मै ख्वाब लिखूँ मेरी बातों को न समझेगी…पगली  क्यो समझाने की बात लिखूँ… मै लिख तो दु तेरी Continue reading मन के झूठे मै ख्वाब लिखूँ

जब याद तुम्हारी आती है

जब याद तुम्हारी आती है ये वक़्त ठहर सा जाता है आंखो से पानी गिरता है पलके भारी हो जाती है ॥ जब याद तुम्हारी आती है मेरी  साँसे रुक सी जाती है॥ इजहार तेरा इकरार तेरा और पल दो पल का साथ तेरा कभी बैचनी सी बढ़ती है …. जब याद तुम्हारी आती है ॥ वादा कर के भूल गयी॥ क्यो पगली मुझसे रूठ गयी… सुन दिल मे तू ही समाई है॥ जब याद तुम्हारी आती है मेरी  साँसे रुक सी जाती है॥ तुम्हारा पल मे हसना… पल मे रूठ जाना याद आता है और जो मै रूठ जाऊ Continue reading जब याद तुम्हारी आती है

सृष्टि

नभ में अरुणिमा का प्रसार क्षितिज सुनहला, वृहत विस्तार प्रकृति ने धारे नव्य अलंकार वसंत ने दिया रूप संवार ।। प्रातः के नित्य रूप अभिनव कूजते, कुहुकते पंछियों का कलरव अर्चना के बहें स्वर अनुपम भोर की पुरवा में घुलता सरगम ।। पुलकित, चंचल, किलकते बाल गौओं को ले जाते पशुपाल सुकोमल नार भरे गागर ताल खेतिहरों ने लिए हल सँभाल ।। प्रहर चढ़ा, हुआ तप्त मलय दिवाकर का रूप अति तेजोमय पथिक सोए अमराई की छाँव निश्चल, शांत, शिथिल हुआ गांव । । प्रतीची की ओर बढ़े विवस्वान संध्या ने किया निशा का आह्वान तारों और मृगांक का रुपहला Continue reading सृष्टि

राजनीति का खेल

हम क्यों राजनीति में घुस जाते है l राजनीति पार्टी को दिल से लगाते है ll पार्टी कोई भी हो वो रंग जाती है l वो सिर्फ अपनी कुर्सी बचाती है ll राजनीति तो शतरंज की बिसात है l इसको समझ पाना टेढ़ी बात है ll ये आज लड़ते है फिर मिल जाते है l हम यू ही आपस में लड़ते जाते है ll मत छोड़ो दिलो में राजनीति की छाप l वो कांग्रेस हो बीजेपी हो या हो आप ll हमारे भूखे पेट को ये नेता नहीं भरेंगे l ये तभी भरेंगे जब हम मेहनत करेंगे ll आओ प्रण Continue reading राजनीति का खेल

घमंड

घमंड पैसो से सब खरीद लोगो तुम l क्या अपनी सांसे खरीद पाओंगे ? फिर क्यों है घमंड इन पैसो का ? जब सब कुछ यही छोड़ जाओंगे ll क्यों करते हो इस रूप पर घमंड ? ये रूप एक दिन यू ही ढल जाएगा l सवारना है तो अपने मन को सवारों l सच्चा मन ही तुम्हे सुंदर बनाएगा ll क्यों करते हो अपनी भक्ति पर घमंड ? दिया जलाने से सब भक्त नहीं बन जाते l ईश्वर तो स्वयं उसके भक्त बन जाते है l जो निरस्वार्थ दूसरों की सेवा करते जाते ll मत कर अपनी किस्मत पर Continue reading घमंड

सच से रूबरू

सच से रूबरू हो जाता हू l जब में अस्पताल जाता हू l अपने दर्द को भूल जाता हू l जब दूसरों को दुःखी पाता हू ll सच से रूबरू हो जाता हू l जब में शमशान जाता हू l चिता की जलती हुई अग्नि में l अहम को जलता हुआ पाता हू ll सच से रूबरू हो जाता हू l जब किसी वृद्ध को सामने पाता हू l रूप पर गुरुर करना भूल जाता हू l जब उसके चेहरे में अपना चेहरा पाता हू ll सच से रूबरू हो जाता हू l जब मौत को करीब देख पाता हू Continue reading सच से रूबरू

विवाहित की पहचान (व्यंग)

हम पर ही क्यों इतनी बंदिश लगाई जाती है l माँग में सिन्दूर और चुटकी पहनाई जाती है ll हम तो दूर से ही शादीशुदा नज़र आते है l पुरुष शादीशुदा होकर भी कुंवारा बताते है ll कोर्ट ने महिलाओ के फरमान पर किया ऐलान l शादीशुदा पुरुषों पर लगेगा “सूरज” का निशान ll जिससे ये निशान पुरुषों में दूर से नज़र आएगा l और पुरुष अपने को कुंवारा नहीं बता पाएगा ll एक पुरुष के दिमाग में खुरापाती ख्याल आया l उसने माथे से “सूरज” के निशान को मिटाया ll पराई नारी को बिना किसी डर के छेड़ने लगा Continue reading विवाहित की पहचान (व्यंग)

मेरा नाम आया..

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ बेताब था बहुत लेकिन मुझे आराम आया, गुनाहों के खुनी पन्नों पे जब मेरा नाम आया, ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ वक़्त की रेत थी जो हाथों से अब जा चुकी थी, मोहलत अब क्या मांगू जब नया फरमान आया, ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ बदलती राह अब तब्दील हुई गलियों के बीच, उस ख़ौफ़ में भी वो तो सर-ए-आम आया, ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ इंसान भी नहीं बाकि रहा इस खेल में अब, मंजर मौत का था ना कोई निशान आया, ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ रुपहले चेहरे अब और धुंधले से हो चुके थे, तन भी थक चूका था ना कोई आराम आया, ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ काल भी जैसे अब मुझको है लगता भूल Continue reading मेरा नाम आया..

मेरा प्यार हो तुम

मेरा  प्यार हो तुम पगली मेरा प्यार हो तुम, सच पगली मै कैसे बताऊ.. मन के मेरे आस हो तुम ।।   जुड़ी तुमसे मेरी सब यादे है रिस्ता मेरी जान हो तुम …   भूल कोई ना दोष तुम्हारा .. कब तुमने मुझको चाहा था॥ मुझसे तो था बस मन बहलाना मैंने ही अरमान सजाया था   वो भी अच्छा, तुम भी अच्छी मै ही तो एक पागल था॥ मेरा दोष यही पगली तुझको अपना मैंने माना था ॥   सच कहती हो रिस्ता क्या है ? भूल गयी जब वादे तुम ..पर तुमसे जुड़ी मेरी सब यादे है Continue reading मेरा प्यार हो तुम

गंगा

निर्मल है,पावन है,स्वच्छ है गंगा l चीख-चीख के कह रही ये गंगा l पापों को तुम्हारे मैं हर लूंगी l पर मत करो मुझे और गन्दा ll इसी जल के स्नान से पवित्र होते l फिर क्यों इसमें तुम कपड़े धोते l पूजा-सामग्री क्यों इसमें बहाते l धर्म की आड़ में गन्दगी फैलाते ll स्वच्छ मैं रहूंगी तो स्वच्छ रख पाऊँगी l निर्मल जल से गंगा कहलाउँगी l गंदगी से यू मेरा अस्तित्व ना रहेगा l मैं ना रही तो, तू भी ना रहेगा ll करुँ मैं विनती तुमसे बन्दे l हर हर गंगे जय माँ अम्बे l मिलकर गंगा Continue reading गंगा

चापलूसी

मेरी कुछ पंक्तिया है आजकल जो बहुत चापलूसी चलती है उसके उपर, शायद यह कविता किसिको पसंद ना आये, पर आप जरा आपने इर्द-गिर्द़ गौर से झांकोगे तो शायद आपको इस कविता का एहसास जरुर होगा, कृपया पूरा पढे ओर पसंद आये तो जरुर शेअर करे *चापलूसी* हमने देखा है, नाकामियों को बहुत कुछ मिलते हुये, और काम करनेवालों को हमेशा उम्मीद मिलते हुये, यहा चापलूसीवालों का होता है हमेशा जयजयकार, उनको ही मिलती है बढाव और बोनस मेरे यार खासीयत होती है उनमे कुछ खास, चाटने से ही मिलती है उने खुशी का एहसास बिचारे काम करनेवाले काम ही Continue reading चापलूसी