लड़की कोई दीवानी थी

लड़की कोई दीवानी सुनसान राहों में मंथर पग धरती लड़की कोई पगली दीवानी थी निकली हमसफ़र की तलाश में भटकती कोई बेखबर जवानी थी मदहोशी में डूबा यौवन उसका इस ख्याल से जैसे अनजानी थी तरुणाई की गुलशन की गरिमा इठलाती इतराती गजगामिनी थी अल्हड़पन जिसका गगन चूमता जवां धड़कनों की वह कामिनी थी चाँद भी झांकता उसके आँचल से वो दमकती अलौकिक चांदनी थी चंचल हिरणी जैसी चाल उसकी कपोलों पर मुस्कान मस्तानी थी धानी दुपट्टा लहरा जाय हवा में आखों की चमक आसमानी थी लाल अधरों से टपकता मधुरस बेफिक्र लड़की कोई दीवानी थी मैं ढूंढता रहा जिसे Continue reading लड़की कोई दीवानी थी

हे काल! मत छेड़ ताण्डव ताल

हे काल! मत छेड़ ताण्डव ताल प्रलय नृत्य सिन्धु मध्य विकराल। माना जग है माया का मिथ्या प्रवाह मानव मन गरलयुक्त उरपीड़क प्रदाह। मत खोल तू त्रिनेत्र मध्यभाल हे काल! मत छेड़ ताण्डव ताल। है अनंत शून्य-सा हर मानव कंकाल घेरे जिसको काम क्रोध लोभ जंजाल। तज दे यह विकट रूप तत्काल हे काल! मत छेड़ ताण्डव ताल। अब कहाँ है पाप-पुण्य में भेद अनेक भ्रम में है सब वाद विवाद, तर्क विवेक। इस युग का मानव क्षुद्र शृगाल हे काल! मत छेड़ ताण्डव ताल। आसुरी शक्ति से व्याकुल मानव दिखते मरण भूमिका जीते जी सब जन रचते। भय का Continue reading हे काल! मत छेड़ ताण्डव ताल

मौन किये हैं मेरे गीत

मौन किये हैं मेरे गीत रुककर तेरे वाद्यवृंद ने मौन किये हैं मेरे गीत गूँगे स्वर हैं, बधिर राग है हैं अपंग अब मेरे गीत अलंकार तज, अहंकार ले हैं अधीर कुछ बोल अमोल फटे पुराने चिथड़ों में अब भटक रहे गीतों के बोल तेरे चुप होने से मानो भावशून्य हैं मेरे गीत रुककर तेरे वाद्यवृंद ने मौन किये हैं मेरे गीत। लगते अनजाने से मानो सप्त स्वरों के नवश्रंगार मौन निमंत्रण देने को भी लजा रहे हैं मृदु उद्गार वाद्यों पर उन्मत्त नाचना भूल गये ये अपनी रीत रुककर तेरे वाद्यवृंद ने मौन किये हैं मेरे गीत। भग्न छंद Continue reading मौन किये हैं मेरे गीत

ए नाविक उठो

ए नाविक उठो नभचर के गीत सुनो, ए नाविक उठो। तट पर खड़े तुम यूँ कब तलक रुकोगे नाव का लंगर उठाओ अब आगे बढ़ो शोर लहरों का सुन कब तलक डरोगे नाव की पतवार थामे, बढ़ते चलो। थकान का पर्दा अब मन का हटाओ लक्ष्य पलकों में सजाकर आगे बढ़ो आ रहे तूफान लेकिन तुम मत डरो तुम तरंगों से नाव टकराते चलो। कर्म धर्म से मन अपना विकसित करो नभचर के गीत सुनो, ए नाविक उठो। तट पर यूँ खड़े तुम तरंगें मत गिनो उल्लास तरंगित कर बस चल़ते चलो ललकार लहरों की सुनो, पर ना डरो गीत Continue reading ए नाविक उठो

मेरे गीतों में आँसू मधुरस बन आते हैं

मेरे गीतों में आँसू मधुरस बन आते हैं जिन्हें बीन प्रभू अपनी आँखों पनपाते हैं। मेरी पीड़ा से अंकुरित हर अश्क चुन चुनकर प्रभू अपनी आँखों के सब आँसू दमकाते हैं। पीड़ा मुखरित करने जब मेरे आँसू झरते हैं ओसकणों की बारिश से वे जा मिलकर बहते हैं सूरज की सहस्र रश्मियाँ भी नभ में आकर छू लेती है जब पुष्प् अधरों पर खिलने लगते हैं। मेरे गीतों में आँसू मधुरस बन आते हैं जिन्हें बीन प्रभू अपनी आँखों पनपाते हैं। मेरी पीड़ा के गीत जब भी मेरे प्रभू सुनेंगे उनकी अपनी आँखों में भी अश्रूकण दमकेंगे यूँ मेरे आँसू Continue reading मेरे गीतों में आँसू मधुरस बन आते हैं

मेरे गीतों को संकेत मिले हैं

मेरे गीतों को संकेत मिले हैं आज पुनः मेरे गीतों को आँसू के संकेत मिले हैं। व्यक्त वेदना करने को फिर टूटी वीणा के तार मिले हैं। तेरी मूरत मन में मेरे नित श्रद्धा का रस भरती है और प्रेरणा स्वरगति को भी भक्ति-भाव से नित मिलती है। पर दीनों में दीन मुझे तो तुझसे तृष्णा के हार मिले हैं आज पुनः मेरे गीतों को आँसू के कुछ संकेत मिले हैं। व्यक्त वेदना करने को फिर टूटी वीणा के तार मिले हैं। पुष्प-कलश-सा यह तन मैने पाया जब तेरे कूलों से सोचा झटपट इसको भर ल तेरी वाटिका के फूलों Continue reading मेरे गीतों को संकेत मिले हैं

चांदनी

चाँद के नन्हे ख्वाबों से आज, चुरा कर लाया हूँ कुछ चांदनी। समेट कर इसकी आभा को, रात सोती ओढ़े चादर चांदनी। फ़िज़ाओं ने पूछा चांदनी से, कहाँ से लाती हो ऐसी चांदनी। अधरों पर निशब्द भाव लिए, आँचल ओढ़े लजा गई चांदनी। देवलोक से उतरी है धरा पर, लगाकर पंख धवल चांदनी। मंत्रमुग्ध हो गई रात की रानी, निहार कर अलौकिक चांदनी। यौवन ने जिस पल दी दस्तक, दहलीज़ पर खड़ी थी चांदनी। सौंदर्य की तरुणाई में नहाई, मनमोहिनी रूप लिए चांदनी। मदहोश तारों की बारात संग, दुल्हन के शृंगार में सजी चांदनी। चांदी के रथ पर हो कर Continue reading चांदनी

उड़ियाना छंद “विरह”

उड़ियाना छंद “विरह” क्यों री तू थमत नहीं, विरह की मथनिया। मथत रही बार बार, हॄदय की मटकिया।। सपने में नैन मिला, हँसत है सजनिया। छलकावत जाय रही, नेह की गगरिया।। गरज गरज बरस रही, श्यामली बदरिया। झनकारै हृदय-तार, कड़क के बिजुरिया।। ऐसे में कुहुक सुना, वैरन कोयलिया। विकल करे कबहु मिले, सजनी दुलहनिया।। तेरे बिन शुष्क हुई, जीवन की बगिया। बेसुर में बाज रही, बैन की मुरलिया।। सुनने को विकल श्रवण, तेरी पायलिया। तेरी ही बाट लखे, सूनी ये कुटिया।। विरहा की आग जले, कटत न अब रतिया। रह रह मन उठत हूक, धड़कत है छतिया।। ‘नमन’ तुझे भेज Continue reading उड़ियाना छंद “विरह”

32 मात्रिक छंद “जाग उठो हे वीर जवानों”

32 मात्रिक छंद “जाग उठो हे वीर जवानों” जाग उठो हे वीर जवानों, तुमने अब तक बहुत सहा है। त्यज दो आज नींद ये गहरी, देश तुम्हें ये बुला रहा है।। छोड़ो आलस का अब आँचल, अरि-ऐंठन का कर दो मर्दन। टूटो मृग झुंडों के ऊपर, गर्जन करते केहरि सम बन।।1।। संकट के घन उमड़ रहे हैं, सकल देश के आज गगन में। व्यापक जोर अराजकता का, फैला भारत के जन-मन में।। घिरा हुआ है आज देश ये, चहुँ दिशि से अरि की सेना से। नीति युद्ध की टपक रही है, आज पड़ौसी के नैना से।।2।। भूल गयी है उन्नति Continue reading 32 मात्रिक छंद “जाग उठो हे वीर जवानों”

आजादी का मान बढ़ाने

आजादी का मान बढ़ाने आवो मिलकर रहना सीखें हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सबसे मिलकर जीना सीखें। सब धर्मों का सम्मान करें मंदिर, मस्जिद में भी जावें गुरुवाणी का भी जाप करें गुरुद्वार पर शीश नवायें। मीठी वाणी कहना सीखें मुस्कान मधुर सी उपजायें हँसते हँसते सफर करें हम जब जब जीवन पथ पर आवें। और परिंदों सा उड़कर हम गीत प्रेम का गाते जावें चहूँओर गावों, नगरों में देशप्रेम की अलख जगायें। अपने घर के बच्चों को भी हम अच्छी बातें सिखलायें उत्तमतम संस्कार हमारे वे भी पाकर तर तर जावें। बाँट बाँटकर अमरुद खायें भूखों को रोटी दिलवायें प्यासों Continue reading आजादी का मान बढ़ाने

आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना

आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना लक्ष्य सामने ही होता है हमने यही है जाना। सीना ताने बढ़ते रहना नजर सभी पर पैनी रखना हिम्मत से मन काबू रखना उत्साह हमेशा कायम रखना। यही शौर्य का मूलमंत्र है वीरों ने यही है माना आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना। बाधायें आती रहती हैं पर हरपल हिम्मत देती हैं हौसला भी ताजा रखना है हर कठिनाई सिखलाती है। दुविधा में उल्लास जगाना हमने सबक है सीखा आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना। चलते चलते थक ना जाना आलस का भी नाम न लेना समय समय Continue reading आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना

नहीं कह पायी

आज फिर मैं कहना चाहती थी, मत जाओ, मेरे लिए रूक जाओ “नहीं कह पाई” आज फिर मैं थाम लेना चाहती थी जोर से तुम्हें अपनी बाहों में कि मेरी सांसों के साथ साथ तुम भी पिघल जाओ “नहीं कर पाई” आज फिर रोक देना चाहती थी, रात को जो मुझे तुम से अलग करती है ” नहीं कर पाई” आज फिर बता देना चाहती थी कि तुम्हारे बिना कितनी अधुरी हूं मैं रोम रोम मेरा तरसता है तुम्हारे स्पर्श को हर धड़कन मेरी सुनना चाहती है तुम्हारी आवाज़ आंखें तुम्हें ही ढुढती है हर पल हर घड़ी तुम्हारा ही Continue reading नहीं कह पायी

देखी थी जीवन की छवि प्यारी

देखी थी जीवन की छवि प्यारी वह मोहक प्यार भरी ममता की थी जिसमें हर प्रतिमा सुन्दर सी भरती थी किलकारी बचपन की पर अंतरपट में उभर रही थी छवि यौवन की मदमस्त भँवर सी जिसमें परछाई इठलाती थी खुद से अनजानी अभिमानी सी देखी थी तरुणाई जीवन की विविध रंग की, विचित्र रूपों की दर्पण में दर्शन नित करती सी पर छवि दरक गई हर दर्पण की। श्रंगार शून्य ले अंतिम क्षण की आँसू के कलरव में छिपती सी शर्माती, सकुचाती, अलसाई सिहर उठी मुस्काती तरुणाई देखी थी जीवन की चतुराई जो शब्दकोश से सजी हुई थी मगर बुद्धि Continue reading देखी थी जीवन की छवि प्यारी

मुस्कानें

मुस्कानें अनजानों में अनजान बना पहचान बनाने जब मैं निकला सबकी आँखें नम दिखती थी मैं मुस्कान सजाने जब निकला। मूक बनी बिखरी आवाजें सबके लब पर थर्राती थी जंजीरों में बंधी उदासी सबके दिल को कलपाती थी मैंने चाहा महके जग तो मुस्कानें खिलने शर्माती थी। अनजानों में अनजान बना पहचान बनाने जब मैं निकला। नाव उतारी जब जब मैंने तूफान उठा था उलझाता लहरों के आँचल में बिंधकर था आँसू मोती दमकाता मैंने चाहा उनको चुनकर हर मुस्कानों की दमक बढ़ाता अनजानों में अनजान बना पहचान बनाने जब मैं निकला। जहाँ तहाँ जीवन के पथ पर साँसें बस Continue reading मुस्कानें

मौत की शायस्तगी अच्छी लगी

मौत की शायस्तगी अच्छी लगी जिन्दगी से रिहाई अच्छी लगी। खबर उनके ना आने की मिली महफिल में तन्हाई अच्छी लगी। बात दिल की बहुत पुरानी तो थी जब जब सुनी कहानी अच्छी लगी। खत पे अश्कों की नमी भली लगी कलम की ये रवानी अच्छी लगी। चाँदनी संगेमरमर पे भली लगी खुले रंग पे जवानी अच्छी लगी। डाल पे सैले-हवा पर झूलती खारो-गुल की दोस्ती अच्छी लगी। 00000 शायस्तगी — सभ्यता, रिहाई — छुटकारा सैले-हवा — हवा का झोंका                       … भूपेन्द्र कुमार दवे