दिल

दिल हो दिल किसी गरीब का तो घर ढूँढ़ता है दीवाने का हो दिल तो दिलवर ढूँढ़ता है . अंधे का हो जो दिल तो ऩज़र ढूँढ़ता है पागल का दिल हमेशा सफर ढूँढ़ता है . हो राहगीर का दिल तो डगर ढूँढ़ता है दिल हो सलिल का तो लहर ढूँढ़ता है . किसान का दिल मौसम बेहतर ढूँढ़ता है मरीज दिल दवा का असर ढूँढ़ता है . पर दिल *गोविन्द का तो है बेखबर इन सबसे जो माता के आँचल में ईश्वर ढूँढ़ता है ©Satyendra Govind (Bettiah,Bihar)

प्यारा झूठ

प्यारा झूठ झूठा सा सच वो, ले चला मुझको यादों के वन में, सच से भी प्यारा लगता, वो झूठ मुझे इस जीवन में…. एक झूठ, जो सच से भी है प्यारा मुझको, झूठ ही जब उसने कहा, तुझसे प्यार है मुझको, खिले थे कितने ही कँवल, सपने दिखते थे मुझको, झूठा सा सच वो, बाँध रहा आज भी मुझको। क्यों लगता कोई झूठ, कभी सच से भी प्यारा, कौन यहाँ कब बन जाता, पलभर में जीने का सहारा, मिट्टी का है यह तन, पर मन तो ठहरा इक बेचारा, प्यार ढ़ूंढ़ता उस झूठ में, फिरता दर-दर मारा। तिनका भर Continue reading प्यारा झूठ

याद आते है वो दिन

याद आते है वो दिन आज भी याद आ जाते है वो दिन l जब फिल्म आती थी सिर्फ एक दिनll रविवार को रहता था उसका इंतजार l खाना बनाकर,रहते थे देखने को तैयारll आज भी याद आ जाते है वो दिन l अपनों की चिट्ठी आती जिस दिनll चिट्ठी में लिखे शब्द याद आते है l कुशलता भगवान से नेक चाहते है ll आज भी याद आ जाते है वो दिन l कागज़ की कश्ती बनाते जिस दिन ll अपनी कश्ती को पानी में बहाते थे l कोई भी जीते,सब खुश हो जाते थे ll आज भी याद आ Continue reading याद आते है वो दिन

रज रेणुका यादों की

रज रेणुका यादों की रज रेणुका असंख्य तेरी यादों के, दैवात बिखर आभूषित इस मन पे, धुल रही रेणुकाएँ प्रभा तुषार तुहिन में, भीग रही वल्लिका बेलरी शबनम में। लघु लतिका सी यादों के ये पल, लतराई दीर्घ वल्लिकाओं सी इस मन पर, ज्युँ कुसुमाकर की आहट ग्रीष्म ऋतु पर, प्रभामय दिव्यांश मेरी प्रत्युष वेला में। अति कमनीय मंजुल रम्य वो यादें, तृष्णा पिपास नूतन अभिनव सी, मौन तोड़ बहती तन मे शोनित रुधिर सी, द्युति सी ये यादें मोद प्रारब्ध जीवन में। अलौकिक शुचि वल्लिकाओं सी यादें, मधुऋतु विटप सी आवरित जीवन में, आख्यायिका कहती ये तेरी गठबंधन के, Continue reading रज रेणुका यादों की

कोरा मन

कोरा मन माने ना ये मेरी बात, ये कैसे हैं……कोरे जज्बात? कोरा…..ये मेरा मन….., पर ये जज्बात हैं कैसे, अनछुए….. से मेरे धड़कन..,,, पर ये एहसास हैं कैसे, अनजाना…. सा यौवन…., पर ये तिलिस्मात हैं कैसे, मन खींचता जाता किस ओर, ये अंजान है कैसे? यौवन की…..,, इस अंजानी दहलीज पर, उठते है जज्बातों के………ये ज्वार…. किधर से, कौन जगाता है …..एहसासों को चुपके से, बेवश कर जाता मन को कौन, ये अंजान है कैसे? खुली आँख… सपनों की …होती है फिर बातें, बंद आँखों में ….न जाने उभरती वो तस्वीर कहाँ से, लबों पर इक प्यास सी…जगती है फिर Continue reading कोरा मन

नेह चाहता स्नेह

नेह चाहता स्नेह नेह पल रहा मन में तुम स्नेह का इक स्पर्श दे दो….. स्नेह अंकुरते हैं तेरी ही कोख में, धानी चुनर सी रंगीली ओट में, कजरारे नैनों संग मुस्काते होठ में…., तड़पता है प्यासा नेह तुम स्नेह की बरसात दे दो…. नित रैन बसेरा तुम संग स्नेह का , आँगन तेरा ही है घर स्नेह का, तेरी ही बोली तो बस भाषा स्नेह का…., मूक बिलखता है नेह तुम स्नेह का मधु-स्वर दे दो….. स्नेह उपजता है तेरे हाथों की स्पर्श से, स्नेह छलकता तेरे नैनों की कोने से, जा छुपता है स्नेह तेरी आँचल के नीचे….., Continue reading नेह चाहता स्नेह

औरत की कहानी

औरत की कहानी एक बेटी जो बचपन में बाप का घर खुशियो से भर देती है। अपनी नादानियों से हर होंठो पर मुस्कान भर देती है। जो उम्र भर बाप का साया बन कर रहती है, जवानी तक बाप के सिर पर बोझ बन जाती है।। किसी तरह बाप अपनी जिम्मेदारियो से पलड़ा झाड़ता है, ढूंढ कर बेटी के लिये कही से एक दूल्हा ले आता है।। ब्याह कर बेटी अब ससुराल को चली जाती है, सुन-सुन कर ज़माने के ताने नये रिश्ते निभाती है। कभी पत्नी तो कभी बहू, हर रिश्ते में रंगती जाती है, फिर भी सिवाय तकलीफो के और कुछ नही पाती है।। आखिर एक दिन वो माँ बन जाती है, नयी उम्मीदें उसका दरवाज़ा खटखटाती है। दिलों जान से अब वो औलाद में खो जाती है, अपना हिस्सा भी बेटे को दे कर मुस्कुराती है।। बुढ़ापे में वही औलाद मुँह फेर जाती है, जिसके हाथ का निवाला खा कर बड़े हुए, उसे एक निवाला देने से भी कतराती है।। एक औरत की बस यहीं कहानी है, कभी मर जाती है खुद से, तो कभी मार दी जाती है। कही बलात्कार कर बेबस छोड़ देते है दरिंदे, तो कही तेजाब फेक कर चेहरे बिगाड़े जाते है। कही दहेज़ की आग में जला दी जाती है, तो कही पैदा होने से पहले ही क़त्ल कर दी जाती है। हर औरत की यही कहानी है, कभी मर जाती है खुद से, तो कभी मार दी जाती है। ***नि-3***

शिक्षक दिवस

शिक्षक दिवस जिन राहों पर भारी क़दमों से रखता है, हर बचपन अपने क़दमों को, एक हाथ जो सम्हाल कर, सही मार्ग दिखा कर चलाता है सबको , गलतियों पर डांट कर, अच्छाइयों पर ताली बजा प्रोत्साहित करता  है जो, माता – न पिता होता है, पर उनसे भी बढ़कर भलाई का मार्ग दिखाता है जो, ऊंचाइयों पर पंहुचा दें, एक ही मकसद होता करता है मार्ग दर्शन  जो , अध्यापक हर जीवन में हजरूरी, ये अब क्या समझना  हमको , एक ही  दिन उनके सम्मान का हो ऐसा तो जरूरी नहीं, हर बचपन को सीखना होगा सम्मान करना उनका, Continue reading शिक्षक दिवस

मेरा सच्चा प्यार

मेरा सच्चा प्यार हम तो बस हैं उस खुदा के मुरीद, जहाँ में जन्म लेने का मिला है जो अवसर हमको, उसकी बनायीं धरा खूबसूरत, घाटियां खूबसूरत, पहाड़ खूबसूरत, वादियां खूबसूरत, नदी की धारा मिले समंदर में वो नज़ारा खूबसूरत, न कोई बना सकता इससे खूबसूरत कोई मंज़र खूबसूरत, नज़र जाये जिस तरफ भी जिस शख्स पर वो हर शख्स खूबसूरत, उसकी पूजा से मिले जो शांति वो सुकून बहुत ही खूबसूरत, सोचते हैं सब मैं सबसे बड़ा, सबसे खूबसूरत मेरी नज़र में तो उसका नूर खूबसूरत, उसके नैनों में खुद को बसा लूँ, दिल में अपने उसकी तस्वीर बसा Continue reading मेरा सच्चा प्यार

अब उम्मीद छूटती जाती है

अब उम्मीद छूटती जाती है बरसो बीते इंतज़ार में, अब आस छूटती जाती है। खुद को समझाता, हिम्मत बंधाता, आस की नोका लिये जब किनारे तक आता हूँ, उम्मीद फिर डूबती जाती है। तुम तो बता कर गए थे फिर लौट कर ना आओगे, मैं बांवरा चमत्कार की उम्मीद में हु की तुम आओगे। सुबह की रौशनी जब फीकी पड जाती है, साँझ और साँझ से फिर रात हो जाती है। तुम नही आते मेरी आस फिर छूटती जाती है। एक तस्वीर है तुम्हारी हर रात सिरहाने रख कर सोता हु, कोई है ही नही जिससे अपना हाल सुनाऊ, मै Continue reading अब उम्मीद छूटती जाती है

गुरु तो गुरु है

गुरु तो गुरु है हर इंसान दूसरों से कुछ न कुछ सीखता है l हर किसी को उनमे अपना गुरु दिखता है ll कोई किताबी शिक्षा देकर गुरु कहलाता है l कोई काम सिखा, पेट की आग बुझाता है ll कभी छोटे से बच्चे से ज्ञान मिल जाता है l कभी बड़े को समझना मुश्किल हो जाता हैll इस जीवन को नई दिशा देने वाला गुरु है l छोटा हो या बड़ा गुरु तो आखिर गुरु है ll माँ ने चलना सिखाया तो पिता ने संभलना l गुरु ने सिखाया ज्ञान के दीपक का जलना ll सीखते है हर पल नहीं Continue reading गुरु तो गुरु है

सोच बदलो

सोचा था ऐसा होगा,सोचा था वैसा होगा l ना सोचा ऐसा होगा, ना सोचा वैसा होगा ll सोचा था सोच जब दिलो दिमाग पर छाएl क्या हुआ, क्यों हुआ कुछ समझ ना आये ll जानता हू मै हर सोच पूरी नहीं हो पाती l बिन सोचे मंजिल कभी नज़र नहीं आती ll जो सोचते है उसके ही सपने बुने जाते है l बिन सोचे कभी कामयाब नहीं हो पाते है ll सोच हमेशा दो रूपों मे नज़र आती है l सकरात्मक व नकरात्मक कहलाती है ll सकरात्मक जहां आगे बढ़ना सिखाती है l नकरात्मक स्वयं की नज़रो में गिराती है ll Continue reading सोच बदलो

चाह है कि गीत मैं कुछ ऐसा गाता चलूँ

चाह है कि गीत मैं कुछ ऐसा गाता चलूँ दर्द सारे गोद ले मैं चूमकर दुलार दूँ चीखती पुकार सभी मैं गीत से सँवार दूँ सजल सिसकती आँख को आस की पतवार दूँ और उखड़ती साँस को इक नई रफ्तार दूँ गीत ऐसा मैं चुनूँ जग की पीड़ा गा सकूँ चाह है कि गीत मैं कुछ ऐसा गाता चलूँ भटके हुए पंथी को मंजिल की पुकार दूँ मोड़ पर ठहरे हुओं की राह भी सँवार दूँ नक्शे-कदम दिखते रहें हौसले हजार दूँ शूल फूल से लगें ऐसा पथिक को तार दूँ धूल धरती की उड़े तब भी मैं चलता रहूँ Continue reading चाह है कि गीत मैं कुछ ऐसा गाता चलूँ

माँ अक्सर पास होती है।

माँ अक्सर पास होती है, जब वक़्त बेवक़्त मोबाइल की घंटी बजती है, और दूसरी ओर से तेरी मधुर आवाज़ मेरे कानों तक पहुँचती है। माँ अक्सर पास होती है।-1 जब तुमसे किसी गीत की फ़रमाइश आती है, और प्रेम गीतों की पंक्तियां मेरी जुबाँ तक आती है। मैं गुनगुनाना चाहता हूँ, हर गीत तुम्हें सुनाना चाहता हूँ।। पर मेरी मज़बूरी भी क्या खूब होती है, माँ अक्सर पास होती है।-2 अक्सर हां-ना में ही जवाब दे पाता हूँ, काफी बातें तुम्हारी मैं टाल जाता हूँ। इश्क़ महोब्बत की हर बात अधूरी छूट जाती है, जब प्यार भरी बातों की Continue reading माँ अक्सर पास होती है।

फलक पे टंगी खुशियाँ

फलक पे टंगी खुशियाँ देखने को तो फलक पे ही टंगी है अाज भी खुशियाँ…….. फलक पे ही टंगी थी सारी खुशियाँ, पल रहा अरमान दामन में टांक लेता मैं भी इनको, पर दूर हाधों की छुअन से वो कितनी, लग रही मुझको बस हसरतों की है ये दुनियाँ। झांकता हूँ मैं अब खुद के ही अंदर, ढूंढने को अपने अनथक अरमानों की दुनियाँ, ढूंढ़़ पाता नहीं हूँ पर अपने आप को मैं, दिखती है बस हसरतों की इक लम्बी सी कारवाँ। गांठ सी बनने लगी है अरमानों की अब, कहीं दूर हो चला हूँ रूठे-रूठे अरमानों से अब मैं, Continue reading फलक पे टंगी खुशियाँ