अनछुए सपने

अनछुए सपने

मैं भी चाहती हूँ देखना
कैसे मुस्कुराता है चाँद
मधुर चांदनी रात में, और
कैसे खिलखिलाते हैं तारे
जब करते है स्नान आकाशगंगा में

मैं भी चाहती हूँ देखना
उस नीले आसमान को
जहाँ हर कोई उड़ना चाहता है, और
चूमना चाहती हूँ
उसके आसमानी कपोलों को

मैं भी चाहती हूँ देखना
सागर की उन उतावली लहरों को
जो चूमना चाहते हैं हिमगिर को और
करना चाहते हैं विश्राम
उसकी चांदनी चादर की शीतल छाँव तले

मैं भी चाहतीं हूँ देखना कि
कितनी आकर्षक दिखती है धरा
बसंत की पीली चुनरिया ओढ़े और
कितनी मनोहर होगा वह दृश्य
जब वनस्पति पीले सागर में डूबी हो

मैं भी चाहती हूँ देखना
बारिश की नहीं-नहीं उन बूंदों को
जो समा जाती है धरती के आगोश में और
फिर बनकर नटखट बुलबुले
उड़ जाती हैं अपनी अनोखी दुनिया में

मैं भी चाहती हूँ देखना कि
कैसे रंग-बिरंगी तितलियाँ
गुनगुनाती हैं सुन्दर फूलों संग और
चुपके से चुराकर मधुर पराग
छुप जाती हैं पत्तियों के झुरमुट में

काश! ये सब सच होता
लेकिन ये सिर्फ़ मेरी कपोल कल्पनाएँ हैं
जो शायद ही कभी आकार ले सकें और
सच की दुनिया में रख सकें कदम
क्योंकि मैं एक नेत्रहीन बच्ची हूँ

(किशन नेगी ‘एकांत’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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