“अनसुनी यादें”

सुनो आज कुछ सुना देता हूं मैं,
तू साथ है मेरे तो गुनगुना लेता हूं मैं.

-> वक्त ना जाया कर, वो तो एहसानफरामोश है.
मेरे गीत लबों पे हैं, तब तू क्यों खामोश है.
संजीदा है तू, या ये खयाल हैं मेरे.
बेबाक है जिंदगी, पर तू क्यों मदहोश है.
खोकर तुम्हे फिर से अपना बना लेता हूं मैं.
सुनो आज …………

-> वो याद आता है मुझे, मां का बेटा कहना.
रुला जाता है मुझे, पिता का बेटा कहना.
बहना कहती है, तू तो मेरा प्यारा भाई है,
सब कुछ यूं ही बदले “मगरिब”, पर तू अच्छा बेटा रहना.
फिर से वो छोटा झुनझुना उठा लेता हूं मैं.
सुनो आज………

श्रेयस अपू़र्व “मगरिब”
भोपाल

6 Replies to ““अनसुनी यादें””

  1. फिर से वो झुनझुना उठा लेता हूँ मैं……
    अद्भुत सर ।।।।

    • Aapko resgister karna padega kavyakosh ki website pe. Jaha kuch din me aapki membership verify hogi.
      After verification aapko ek mail milega then you have the authorization to post your poem.
      We will wait for your poems.
      Hope it will happen soon.

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