अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा

रात भर वह कब्र सारी खँगालता रहा।

 

पहले सभी यादें चुन चुन जलाता रहा

फिर यादों की राख बैठा झुलसता रहा।

 

आँधी में बेपर जिन्दगी ले उड़ता रहा

उड़ते गुबार की मानिंद भटकता रहा।

 

अपने जिस्म की बची साँसें गिनता रहा

फिर भी खुद को खुदा का अक्स कहता रहा।

 

मालूम नहीं ये किसकी बद्दुआ थी कि मैं

उलझनें सुलझाता खुद ही उलझता रहा।

 

अपने होने का अब क्यूँ अहसास हो

खोकर जिस्म मैं पेहरन संभालता रहा।

                 ….  भूपेन्द्र कुमार दवे

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