अपाहिज हुई नैतिकता

सदियों से चली
आ रही परम्पराएं
रुढ़ीवादी मानसिकता
या भोग लालसा
अभी तक नहीं
कोई परिवर्तन
वही भ्रूण हत्या
नारी निर्यातण
आदिम प्रवृत्ति
आधुनिकता में भी
चली आ रही है
वही जघन्य अवस्था
पीड़ित की गुहार
कोतवाल भी नहीं
सुनने को तैयार
न्याय के नाम प्रहसन
अर्थबल या बाहुबल
के सामने निष्फल
मूक मौन समाज
अफसोस के सिवाय
कुछ नहीं देता
देता है तो उपदेश
पीड़ित के अवगुण
खोज खोजकर
चलता है भाषण
जैसे भरी आंधी में
आंखों में किरकिरी
या तेज गति से
पत्ता पत्ता फड़फड़ाये
जैसे द्रौपदी का
वस्त्र हरण
भरी सभा में
जैसे सीता का
पाताल प्रवेश
अपनी अस्मिता बताने,
अपाहिज व्यवस्था
बची हुई नैतिकता
मौन स्वीकृति के
पथ पर
झूठी आश जगाये
परिवर्तन जोड़ता नहीं
नये आयाम और
नहीं बदली मानसिकता
या हम बहरे है
या आँखों के अंधे
सपनों में बदलते हैं
समाज

 

सजन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.