अरमान

जिन अरमानो को
दबा दिया था
वक्त की परेशानीयों में
अनजाने में वही
अक्सर जाग जाते
मेरे सपनों में
बेचैन रातों में
चुभाने लगते डंक
दर्द से बेहाल
छटपटाहट पूरे तन में
चुभती है हर याद
मन के अन्दर में
बदल जाती है
सोच और
अफसोस के
नये आलम में
लगने लगते
डरावने
आजकल
मैं सो नहीं पाता
कंही सताये नहीं
कोई सपने
-सजन

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