अविरल यात्रा

अविरल यात्रा

चलते चलते
उबड़-खाबड़ राहों में
मुसाफ़िर ठहर गया कुछ सोचकर
देखता मुड़कर पीछे
अपने ही पांवो के निशाँ
दबे थे जिनके नीचे कुछ दर्द
कुछ वेदनाओं के असहनीय घाव
अतीत की ख़ौफ़नाक परछाईयाँ
कुछ भूली-बिसरी यादें
जिन्हें वह भूल जाना चाहता है
मगर कुछ जख्म जो अभी हरे थे
रुक-रुक कर चुभते थे बन कर सूल
अतीत के बंद काले पन्ने
कभी चिढ़ाते, कभी घूरते उसको
सिंदूरी आँचल तले ढलती सांझ
सूरज भी हुआ मध्यम क्षितिज में
भोर के चले पंछी थकान समेटे
लौट चले रात्रि विश्राम को
अचानक दे कर तिलांजलि
असमंजस के क्षणों को
बढ़ चले ठिठकें कदम मुसाफिर के
शायद अहसास हो चला था उसे कि
कर्मयोगी ही रहता है सदा
अग्रसर अपने कर्मपथ पर
(किशन नेगी ‘एकांत’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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