असमानता

असमानता

ये समाज की विडंबना है की समाज के अधिकतर व्यक्ति जो की आर्थिक तौर से सम्रुध हे, वे हमारे आस पास जो ग़रीब व्यक्ति हें उनको हीन भावना से देखते हैं . धनी व्यक्ति जब कभी भी किसी निर्धन व्यक्ति से बात करता हे तब वह बिल्कुल अलग अंदाज से बात करता हे एंव मानो उस्से बात कर के कोई मतलब ही नही हे, मानो ईश्वर ने संसार मे जीने का , सोचने का, करने का या फिर विचार प्रगट करने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ धनी व्यक्तियो को ही दिया हैं.

समाज का हर एक व्यक्ति आर्थिक तौर से सम्पन नही हो सकता , कोई व्यक्ति अपने ज्ञान से, कोई अपने कार्य से तो कोई अपने विचार से धनी हे, सभी का अपना अपना महत्व हे. किंतु हमारे समाज मे ये एक परम्परा हे या मान्यता हे की जो व्यक्ति आर्थिक तौर से धनी हे, वह व्यक्ति अच्छा हे एंव उसके विचार अच्छे हे.

प्रत्येक क्षेत्र मे धनी व्यक्ति या व्यक्तियो का ही वर्चस्वा होता है, चाहे वो सामाजिक क्षेत्र हो परिवारिक हो, शिक्षा का क्षेत्र या फिर न्याय पालिका हो करीब करीब हर क्षेत्र मे ग़रीब व्यक्ति के साथ दोहरा मापदंड अपनाया जाता हे.

परिवार मे कोई भी सलाह लेनी हो तो आर्थिक तौर पर धनी व्यक्ति को ही अधिक महत्व दिया जाता हे, जेसे ग़रीब वयक्ति की सोच शक्ति होती ही नही हे,

समाज हर एक व्यक्ति से बनता हे, न की सिर्फ़ धनी व्यक्ति से. समाज मे हर व्यक्ति को समान अधिकार मिलने चाहिए, हमारा संविधान भी सभी व्यक्ति को समान अधिकार देता हे.

तो फिर ये असमानता क्यो?

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