आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती

आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती

कहीं चिन्गारी नहीं दिखती, कहीं जिन्दगी नहीं दिखती।

 

हरइक आवाज ऊँची थी, दूर तक गूँजती गई थी

इस सन्नाटे के आगोश में खामोशी नहीं दिखती।

 

मौत हर रोज दिखती है, लेकिन जिन्दगी नहीं दिखती

गुनाह की फेरिश्त में तड़पती जिन्दगी नहीं दिखती।

 

इस कफस में बैठकर देखो ए सैयाद, मेरे दोस्त!

तेरे कारनामों में रहम की निशानी नहीं दिखती।

 

गुनहगारों में तू भी था, हर इक गुनाह करता हुआ

पर तेरे चेहरे पर खुदा! परेशानी नहीं दिखती।

 

मुझे इस कदर रोता देखकर, तू बस हँसता रहा

क्या तुझे इन आँसू में मेरी हैरानी नहीं दिखती।

 

तू मुझमें समाया था, मेरे साथ तू भी फिरता था

तुझे मैं ढूँढ़ता भी कहाँ मुझे रोशनी नहीं दिखती।

…. भूपेन्द्र कुमार दवे

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