आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है।

 

गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है।

आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है।

 

याद में तेरी खो जाने का मन करता है।

जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है।

 

मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब

इसी सागर में रम जाने का मन करता है।

 

पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं

जीवन को और महकाने का मन करता है।

 

पंख फैलाये थे जिस ममता के आँगन में

आज वहीं पर चहचहाने का मन करता है।

 

उठो माँ, अब आँखें खोलकर तो देखो मुझे

आज रूठकर छटपटाने का मन करता है।

 

आँसुओं की धार में इक कागज की नाव ले

अब बस तुझ तक पहुँच जाने का मन करता है।

…. भूपेन्द्र कुमार दवे

 

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