आज सपने लेने है महगे

आज सपने लेने है महगे

कुछ करने की जिद्द ठानी थी,
खुशियों की करी कर्बानी थी,
नईं सोच के साथ बढ़ रहे,
सपनों को पूरा कर रहे,
आज जगह-जगह पर नैतिकता के,
नाम पर होते है दंगे,
यहाँ खर्चे करने है मुश्किल,
ओर सपने लेने है मंहगे ॥

जिस द्वार से की शुरूआत थी,
उस द्वार ही खङा पाया है,
यहाँ समय ही आगे निकला है,
कुछ हाथ ना अपने आया है,
बदलते दौर की धूल में,
हम पेट को भरना सीख रहे,
एक ही बात को अपनाकर,
हम एक ही रंग में है रंगे ।
यहाँ खर्चे करने है मुश्किल,
ओर सपने लेने है मंहगे ॥

बढ़ते हुए दामों ने आज,
हमारी कमर को तोङ दिया,
जिन सपनों मे जान भरनी थी,
अब तक उसे ना पूरा किया,
इक पल का भी समय नहीं अब,
आराम से बिताने का,
हर राह अब विरान् हुई,
आशाएं सब खाक् हुई,
इन्सान की कीमत कुछ नहीं,
मंहगाई के इस दौर में,
चुप्पी साध कर बैठे है सब,
नेताओं के शोर में,
पैरों मे लगाई है बैङी,
राहों मे लगाए है डंगे ।
यहाँ खर्चे करने है मुश्किल,
ओर सपने लेने है मंहगे ॥

‘विराज’

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"Poet"

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