आता था

अब तो एक भी पहलू ना रुकते हैं वो यहाँ,
जहा से उनका अदब बेहिसाब आता था.
मैं तो सवालो के जालो में उलझ ही जाता हूँ,
जहा से उनका बाअदब जवाब आता था.
ना कभी कर पाया “वो गुरूर” उन्हें खोकर अब मैं,
जहा से निकल कर उनका रूआब आता था.
हर एक महफ़िल से ना हासिल वो बुलंदी भी,
जहा से वो हुस्न-ऐ-किताब आता था.
दरख़्त ही दरख्त हैं अब यहाँ पे मगरिब ,
जहा पे उनका सुनहला हिज़ाब आता था.

श्रेयस अपूर्व”मगरिब”
भोपाल

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