आदमी

आदमी

आदमी सोचता है, कुछ लिखे……
जिंदगी के अव्यावहारिक होते
जा रहे समस्त शब्द से
सार्थक वाक्य बना दे
मुक्त हो जाए उन आरोप से
जिसे स्वयं पर आरोपित कर
थक चुका है, उब चुका है
आदमी सोचता है,कुछ करे…..
सतत मरते हुए कुछ पल जी ले
जीवन के मसानी भूमि पर चंद
उम्मीदों की लक ड़ियाँ ले कर
जला डाले उदासीनता के कफ़न
अचंभित कर दे आदमी ही आदमी को
आदमी सोचता है, कुछ कहे …….
जो कह न पाया कभी किसी से
और न जाने क्या क्या
कहता रहा तमाम उम्र
कि बस एक बार अपनी बात
कह तो ले,भीतर के पार्थिव मौन
पिघला तो ले, अपना किरदार निभा तो ले
आदमी सोचता है,वाकई सिर्फ सोचता है
सोचता ही रह जाता है………………
हर बार मौका हाथ से निकल जाता है
आदमी, आदमी कहाँ बन पाता है…….

About पूनम सिन्हा

M.Sc. Zoology

One Reply to “आदमी”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.