आयो रे सावन झूम के

आयो रे सावन झूम के

रिमझिम-रिमझिम बरसती बूदों का
अलबेला मौसम है सावन
धुप से झुलसती और ताप से बेचैन
धरा की प्यास बुझाता है सावन
पृथ्वी और बादल मिलकर रचते हैं
नए-नए तिलिस्म सृष्टि और हरियाली के
फिर से कोई तान छेड़ता है सावन
हैं इसकी झोली में अनगिनित ख्वाब
कुछ उजले, कुछ भीगे
हम सब के लिए कुछ न कुछ
लेकर आया है दीवाना सावन
अन्न-दाता के लिए धरती की गोद में
फसल के साथ हरित सपने
बोने का मौसम है सावन
प्रेमियों के लिए अपने अधूरे प्रेम का
इज़हार करने का मौसम है सावन
आदि काल से प्रेम ग्रन्थ भी
प्रेमियों के मिलन की चर्चाओं से कभी उजले
तो कभी उनके विरह व्यथाओं से
गीले होते रहे हैं सावन में
प्रेम रस के कवियों के लिए
सोलह-श्रृंगार से सुसज्जित
अपनी नायिकाओं को प्रेम सरोवर
में स्नान करते हुए निहारने का मौसम है सावन
उपस्री के लिए
बनाकर मेघ को प्रेमदूत
अपने प्रेमी को विरह की वेदना
दर्शाने का मौसम है सावन
घनन-घनन गरजते मेघ तले
विरह में तड़पते आँचल को
भिगाने का मौसम है सावन
बावरी बयार भी झूम-झूम कर
है थिरकती नन्ही-नन्ही बूंदों संग
ऐसा मतवाला मौसम है सावन
गहरी निद्रा में मदहोश मेघों के लिए
जागने का मौसम है सावन
(किशन नेगी ‘एकान्त’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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