इधर सांझ भी अलसाई है

इधर सांझ भी अलसाई है

लौट चले है पंछी नीड़ में, तिमिर जो गहराई है,
क्षितिज है मुस्कुराता, इधर सांझ भी अलसाई है|

बयार पग धरे मंद-मंद, डूबती लालिमा मुस्कुराई है,
क्लांति छाई नील गगन में, इधर सांझ भी अलसाई है।

खोई-खोई-सी निशा है, खोई-सी उसकी तनहाई है,
बेक़रार वह पिया मिलन को, इधर सांझ भी अलसाई है।

मध्यम हुई बेचैन किरणें, धुंधली दिनकर की परछाई है,
अधीर मुस्कान लिए लताऐं, इधर सांझ भी अलसाई है।

आकुल मेघा चली परदेश को, पूरब दिशा भी शरमाई है,
बेक़रार क्यों है हर दिल यहाँ, इधर सांझ भी अलसाई है।

प्रचण्ड अहसासों के सन्नाटे में, हर पीर यहाँ परायी है,
रफ़्ता-रफ़्ता पग धरे चांदनी, इधर सांझ भी अलसाई है।
(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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