“इन्सानियत का बैर”

इन्सानियत का बैर,

रिश्तों को काट रहा है,

इन्सान ही इन्सान को,

फायदे के लिए बांट रहा है,

एकता की बातें,

किताबों में ही रह गईं,

अकेले रहना ही,

जीवन का सार बन रहा है,

आपसी सम्झौतो में,

दीवारें खङी हो रही,

जो आपसी दूरियों को,

मजबूत कर रहा है,

किसी के सम्बन्ध में,

कोई बोलता नहीं,

बोलता हे जो,

वहीं पछतावा कर रहा है,

अश्लीलता घरों में भी,

जङे जमाने लगी,

यही सबके जीवन का,

संस्कार बन रहा है,

आदर सत्कार से,

कोसों दूर हुए अब,

नये रिश्तों में ढलना,

इस पीढी का आधार बन रहा है,

इन्सानियत का बैर….

…….

‘विराज’

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"Poet"

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