उन्वान- अब्र

उन्वान-अब्र

गगन बूंदों से भरा धरा पे जो बरस जाता
झूम के लहराती धरती तन हरस जाता

तड़पन की खामोशी अब्र सहज पढ़ पाता
शुष्क धरनी पर बूंद बूंद बरस जाता

अब्र भी टूटकर अगर हल्का गरज जाता
बिलखती धरती का ग़र ये एहसास जाता

नभ में बूंदों से भरा अब्र यों न घुमता
बूंद बूंद की तड़प समझ तरस जाता

आनन्द से झूमती, मन्द मन्द लहराती
अब्र का जब एहसान धरा पे बरस जाता

बूंदों की चाहत न समझ अब्र जो गरजता
कढ़का के बिज़ली चुप चाप खामोश जाता

जो भी कुछ कहना था अब्र तुम से सजन का
कह दी वो बातें अब्र ग़र तुम बरस जाता

सजन

Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*