उपन्यास

घोड़े पर सवार वीरसेन आगे बढ़ रहा था , जंगल के पेड़ो के मध्य बनी सड़क जो बैलगाडियों के आने-जाने से बनी थी पर वीरसेन का घोडा सरपट भाग रहा था , चांदनी रात में पेडो की लम्बी छायाए अजीब से माहोल का आभास दे रही थी ऊपर से झींगुरो की आवाज व कुत्तो के भोकने की आवाज ने माहोल को काफी डरावना बना दिया था और इस माहोल में दूर कही सियार की आवाज आये तो किसी बहादुर व्यक्ति के शरीर में भी डर की झुरझुरी आ जाये तो आश्चर्य की बात नहीं , परन्तु ऐसे माहोल में भी वीर के चेहरे पर दूर-दूर तक डर का कोई नामोनिशान न था । वीर की नज़र बस राह पर थी और हाथ में अपने प्रिय घोड़े “तक्षक” की लगाम थी । यु तो यह सफ़र दिन में रात्रि की अपेक्षा अधिक सुरक्षित रहता परन्तु महाराजा ने याद किया है यह सुनकर वीर स्वयं को रोक नहीं पाया वीर के नाना ने उसे सबेरे तक रुकने को कहा, नानी ,मामा सभी वीर को समझाकर थक गए कि एक रात्रि में कुछ नहीं होने वाला वो युही रात्रि के सफ़र का खतरा मोल ले रहा है परन्तु वीरसेन निकल पड़ा हालाँकि तब तक साँझ ढल चुकी थी परन्तु वीरसेन को साँझ भी रोक न पायी ।

निकलते वक्त वीर को नाना – नानी मामा आदि की तरफ से हजारो सलाह दी गयी कि रात्रि में कही रुकना नहीं है , कोई जंगली जानवर दिखे या उसकी आवाज सुनाई दे तो बच के निकलना है , डाकुओ का खतरा भी है अत: जंगल के अन्दर कही जाने के बजाय सीधे – सीधे रास्ते ही जाना है । सभी की सलाह ध्यान से सुनकर वीर ने सबको आश्वस्त किया की वो सभी बातो का ध्यान रखेगा और वो सभी उसकी चिंता ना करे , निश्चिन्त होकर उसको विदा दे।

वहा से विदा ले कर वीर जब तक नगर से बाहर निकला तब तक अँधेरा गिर चूका था , परन्तु चांदनी रात होने के कारन वीर को किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा था नगर से एक दो कोस चलने पर वीर को रास्ते से हटकर एक तालाब  दिखाई दिया , जिसमे एक मृग झुण्ड पानी पि रहा था । वीर ने अपने घोड़े को धीमा कर वह रुका उस मंत्र मुग्ध कर देने वाले दृश्य को देखने लगा , फिर ननिहाल की नसीहतो को याद कर आगे बढ़ गया । उसने लगभग आधा रास्ता तय कर लिया था । कहने को तो रात्रि का सफ़र खतरों वाला होने की आशंका थी , परन्तु वीर इस सफ़र का आनंद ले रहा था चांदनी रात उसमे वो मंद – मंद पवन जो शरीर को छूती तो ऐसा लगता है कि वो हवा नहीं उसकी प्रेयसी है जो गुदगुदी करने का प्रयास कर रही है , दिन के उजाले में दिल को भाने वाली हरियाली रात के अँधेरे में स्याह लग रही थी परन्तु वीर को डरावनी लगने के बजाय ऐसा आभास दे रही थी जैसे रात्रि में वो हरियाली भी गहन निद्रा में लीन हो ।वीर को ऐसा लगा कि जो गहन अर्थ इस जंगल में रात्रि में प्रतीत हो रहे है वो शायद दिन के सफ़र में नसीब ना होते ।

कही दूर बिच-बिच में रौशनी आ रही थी जो जलती हुई मशालो की थी , ये जंगली गुमक्कड़ परिवारों के डेरे थे वीर जैसे – जैसे आगे बढ़ रहा था ये रौशनी पास आती जा रही थी । कुछ फर्लांग आगे वो रौशनी पास ही थी वहा कोई चार- पांच तम्बू से लगे हुए थे हर डेरे के बाहर मशाल जल रही थी वो अस्थाई डेरो की वजह से किसी छोटे गाँव के होने का अहसास हो रहा था। बाहर कोई न था रात का वक़्त था लाजिमी था कि सभी लोग सोये होंगे घोड़ा सरपट भागे जा रहा था , किन्तु वीर की नज़र उन घुमक्कड़ परिवारों के डेरे पर थी, वीर को कुछ हलचल महसूस हुई । वीर ने अपने घोड़े की रफ़्तार कम कर ली पगडण्डी से एक तरफ एक डेरा था जो तम्बू सा तना हुआ था उसके बाहर मशाल लगी हुई थी जिसकी रौशनी वीरसेन को दूर से नज़र आ रही थी । अचानक घोडा हिनहिनाने लगा , घोड़े की बेचेनी देखकर वीरसेन समझ गया की कोई खतरा है। उसने वहा से निकलना उचित समझा | तभी उसकी नजर मशाल की धुंधली रौशनी में एक नन्ही सी बालिका पर गई जिसकी उम्र मुश्किल से तीन चार वर्ष होगी ,जो उस तम्बू से डेड़ दो फर्लांग दूर झाड़ियो के पास खड़ी थी वीरसेन ने लगाम खिंच कर घोड़े को रोक लीया । वीर समझ ना पाया कि इतनी छोटी बालिका रात के वक़्त अकेले बाहर क्यों है, उसे लगा ज़रूर आसपास उसका कोई अभिभावक भी होना चाहिए वीर ने दो कदम घोड़े को डेरे की तरफ बढाया अचानक घोड़े की हिनहिनाहट तेज हो गई ।

वीर ने दाये बाये देखा परन्तु बालिका के अलावा उसे कोई नज़र ना आया, वीरसेन कुछ समझ पाता तभी उसकी नजर झाड़ियो में गई जहा दो चमकीली आँखे नज़र आई वीर को समझते देर न लगी कि वो कोई खतरनाक जंगली जानवर है अनायास ही वीर का हाथ अपने कमर में बंधी कटार पर गया , घोडा हिनहिनाते हुए अपने कदम पीछे लेने लग गया तो वीरसेन ने अपनी नज़र झाड़ियो पर जमाये हुए अपना दाहिना हाथ घोड़े की गरदन पर फेरा और बड़े प्यार से कहा ” तक्षक डर मत , मैं हूँ ना । ” घोडा उसी जगह रुक गया ।

वो बच्ची खिलखिलाती हुई झाड़ियो की तरफ बड़ी । वीर खतरा भाप गया ,उसे लगा उसने जल्दी ही कुछ न किया तो वो बलिका उस जानवर का शिकार बन जाएगी । वो चमकीली आँखे आगे बड़ी और एक शेर का मुंह दिखाई दिया मशाल की मद्धम रौशनी में । उस शेर की नज़र उस बालिका पर जमी थी , घोड़े और वीर के होने का आभास सिंह को नहीं हुआ ।

बालिका और शेर के मध्य दुरी दो ढाई हाथ से ज्यादा नहीं थी जो शेर के लिए एक फलांग भर थी यदि वीर घोड़े से कूदकर बालिका को बचाने का प्रयास करता तो भी वो बालिका से दूर ही रहता । वीर ने तत्काल निर्णय लेते हुए अपने घोड़े को पैर से एड लगाईं और घोड़े को आगे बढाया । घोडा तेजी से बालिका व सिंह के मध्य की ओर बड़ा वीर बड़ी चतुराई से बालिका की ओर झुका घोडा जैसे ही बालिका और शेर के मध्य पहुँचा , वीर ने बालिका की बाह पकड़ उसे घोड़े पर उठा लिया , घोडा तम्बू के आगे जाकर रुक गया ।

शायद सिंह रात्रि में शिकार की तलाश में निकला हो और इंसानी गंध सुन्गकर इस तम्बुनुमा डेरे की तरफ आगया अपने शिकार को हाथ से जाता देखकर शेर झाड़ियो से बाहर निकल कर दहाडा , दहाड़ सुनकर तम्बूओ में हलचल मच गई । वो पूर्ण वयस्क सिंह था , बड़े बालो वाला पुष्ट शरीर लिए वो शेर एक नज़र में ही डर पैदा करने के लिए पर्याप्त था । वीर कुछ समझ पाता तब तक शेर ने घोड़े पर झपट्टा मारा , सिंह के आगे के पैर के नाख़ून घोड़े के पेट पर लगे । घोडा बुरी तरह लडखडा गया , वीर सेन बालिका सहित निचे गिर पड़ा । इतने में शेर की दहाड़ से जागे उस कबीले सभी व्यक्ति बाहर आ गए , उसमे उस बालिका के माता पिता भी शामिल थे। सामने शेर को खड़ा देख सभी में डर की लहर दोड़ गई , हर कोई जान बचाकर भागने की फ़िराक में लग गया ,इस घटना से बुरी तरह डरी बालिका अपनी माता की और भागी । दो क्षण पहले जहा शान्ति थी वहा गहमागहमी मच गई , वीर ने इशारा कर सभी को शांत रहने को कहा , पल भर में पुन्ह शांति छा गई । शेर घायल घोड़े पर अगला हमला करने वाला था । अपने तक्षक को खतरे में देखकर वीरसेन ने कमर में लगी कटार अपने हाथ में लेकर शेर पर कूदा , कटार सीधी शेर की पीठ में लगी , परन्तु घाव गहरा नहीं लगा , कटार के मार की दर्द से शेर पूरा दम लगा कर दहाडा ।

शेर की दहाड़ से पूरा जंगल थर्रा गया । दो क्षण पहले कबीले के सभी व्यक्ति शेर से डर कर भाग रहे थे वो अब शांत खड़े होकर उस बहादूर युवक और सिंह का युद्ध देखने लगे । ये दहाड़ वीर को ना गवार गुजरी , शेर फ़िर हमला करे तब तक वीर ने शेर के दोनों आगे व् पीछे की टांगे पकड़कर उपर उठा लिया । लड़की के माता-पिता स्तब्ध होकर उस बहादुर व शक्तिशाली युवक का कारनामा देख रहे थे लड़की अपनी माँ की छाती से चिपकी थी । वजनदार शेर को उठाने पर उसकी भुजाये फड़क रही थी और मांसल शरीर देखते ही बनता था , वीर ने दम लगाकर शेर को निचे पटका , बुरी तरह सहमा सिंह किसी बिल्ली की तरह मिमियाते हुए उठकर भाग गया ।

वीरसेन ने एक गहरी साँस ली और उस बालिका के माता-पिता की तरफ देखा । बालिका का पिता आगे आया और हाथ जोड़कर बोला ” हे वीर मैं किस तरह आपका धन्यवाद अदा करू , मेरे पास शब्द नहीं है । आप कोन है ? आपका स्वागत है । ”

” मै सुजानगढ़ के मंत्री अमर्त्यसेन का पुत्र वीरसेन हूँ । ” वीर अपने माथे पर आये पसीने को पोछते हुए बोला ” मैं राह में जा रहा था तो इस बालिका को संकट में देखकर आ गया ।

आप कोन है ? ”

” कुमार हम बंजारे है , पता नहीं कब ये बच्ची बाहर आ गई , रात्रि विश्राम कर हमें स्वागत का सुअवसर प्रदान करे । ”

” श्री मान आपके आमंत्रण के लिए धन्यवाद परन्तु मुझे पो फटने से पहले सुजानगढ़ पहुचना है । ”

” हम छोटे इन्सान है कुमार परन्तु कभी जरुरत पड़े तो हमें याद करियेगा । ”

” अवश्य श्री मान । ”

” मैं आपकी वीरता के आगे नतमस्तक हु कुमार । ”

” अब में प्रस्थान करता हूँ । ” कहकर वीरसेन घोड़े पर चढ़ गया तथा एड लगाई । वीर पुनः उसी पगडण्डी पर बढ़ गया वो स्नेह स्नेह आगे बढ़ता गया उसी तरह स्नेह स्नेह उजाला फेलने लगा । लम्बी यात्रा के पश्चात् वीरसेन को सुजानगढ़ का मुख्य द्वार दिखाई दिया । वीरसेन को सुजानगढ़ की प्रजा अच्छी तरह जानती थी , उसकी वीरता के चर्चे तो पडोसी राज्यों तक फेले थे । लोग झुक झुक कर वीर को प्रणाम कर रहे थे।

*****

पाठक मित्रो आइये हम आपको ले चलते है भारत भूमि के एक राज्य में , जिसका नाम है सुजानगढ़ । यहाँ के महाराजा है चित्रसेन जिनकी उम्र 55 वर्ष है । महाराज वीर व निडर योद्धा है ,जैसा की एक महाराजा को होना चाहिए । जितना प्रेम वो अपने पुत्र राजकुमार प्रद्युमन और पुत्री राजकुमारी स्वाति से करते है , उस से कई गुना प्रेम उनके मन में अपनी प्रजा के लिए है ।महाराज चित्रसेन को यहाँ का शासन विरासत मैं मिला , महाराज चित्रसेन के दादा परदादा सदियों से इस राज्य पर राज्य करते आये है प्रजा का हित करने का गुण उन्हें आनुवांशिक तोर पे मिला , सुजानगढ़ के समृद्ध होने का श्रेय उन्हें और उनके पुर्वजो को ही जाता है ।

महाराज कोई भी निर्णय ,चाहे छोटा हो या बड़ा हो लेने से पहले अपनी प्रजा के बारे में सोचते है। प्रजा का हित उनके लिए सर्वोपरि है , महाराजा की इसी सोच का नतीजा था की सुजानगढ़ की जनता सुखी और खुशहाल थी । महाराजा चित्रसेन की सोच युद्ध और विस्तारवाद की नीति को महत्व देने के बजाय प्रजा के विकास के लिए कार्य करने की थी ।

राजकाज के कार्य में इतने अधिक व्यस्त रहने के कारण महाराजा अपने पुत्र प्रद्युमन के पालन पोषन में उतना ध्यान ना दे पाए जितना देना चाहिए , नतीजा ये निकला की जितनी बुरी आदते थी वो सारी राजकुमार को लग गई । राजकुमार प्रद्युमन को शराब की लत थी जिसे छुड़ाने के अनेको प्रयास महाराज ने किये परन्तु नतीजा कुछ न निकलता था ,शराब की एब तो एक मात्र एब थी जो पुरे राज्य को पता थी । अन्यथा अय्याशी, जुआखोरी ,भांग ,गांजा , चरस आदि का नशा चुपके चुपके हुआ करता था । यु तो वीरता बहादुरी जैसे गुण प्रद्युमन में भी थे , परन्तु ये गुण इन बुरी आदतों के निचे कही दब गए थे। एक अच्छा राजा एक अच्छा पिता  साबित ना हो पाया ।

प्रात: काल का समय है भास्कर देवता पूर्व से उदित हो रहे थे , चिड़िया की चहचाहट का शोर प्रात: कल की गवाही दे रहा है ऐसे मन को मुदित कर देने वाले समय में महाराजा चित्रसेन अपने आसन पर चिंतामग्न मुद्रा में बैठे है अपना चेहरा हथेली पर टिकाए गहरी सोच में डूबे चित्रसेन की तन्द्रा एक सेवक की आवाज से टूटी “महाराजा की जय हो , महामंत्री दर्शनाभिलाषी है ।”

” हूँ ”   राजा अपनी वैचारिक दुनिया से बाहर आए ।

” महामंत्री दर्शनाभिलाषी है ।” सेवक ने दुहराया ।

“उन्हें ससम्मान अन्दर ले आओ ” राजा ने आदेशात्मक स्वर में कहा ।

” जो आज्ञा महाराज । ” सेवक सर झुकाकर बोला और चला गया।

” प्रणाम महाराज । ” अधेड़ उम्र के मंत्री ने अन्दर प्रवेश कर के कहा ।

” आइये विप्रवर आसन ग्रहण कीजिये । ” राजा एक खाली सिंहासन की और इशारा कर बोले ।

” महाराज आप किसी चिंता से ग्रस्त है ? ” राजा के उदास चेहरे को भाप मंत्री अमर्त्यसेन बोले ।

” हा महात्मन , हमें काठवगढ़ क्षेत्र की चिंता है ” ।

” वहा कुछ नया उपद्रव तो नहीं हुआ ? ” अमर्त्यसेन उद्विग्नता से बोले ।

” नहीं महात्मन अमर्त्य ” राजा मंत्री के वेशभूषा और वैचारिक शुद्धता के कारन उन्हें महात्मा ही कहते थे , अपनी बात जारी रखते हुए आगे बोले ” परन्तु उस क्षेत्र में हमारी नीति के कारण पडोसी राज्य हमें कमज़ोर समझ रहे है ।” राजा लम्बी साँस लेकर अपनी परेशानी सपाट शब्दों में कह गए ।

” राजन मैंने तो आपको उसी दिन आगाह किया था जिस दिन आपने उपद्रवीयो के खिलाफ सशस्त्र कार्यवाही करने से मना कर दिया था ।”

” परन्तु उस उसदिन हम अपनी निर्दोष प्रजा पर शस्त्र नहीं उठाना चाहते थे और न आज उठाना चाहते है ।” राजा ने अपना पक्ष रखा ।

” परन्तु आप जानते है महाराज ? कि मामला इतना आगे बढ़ गया है कि कासम खान ने काठवगढ़ को अलग देश घोषित कर स्वयं को वहा का शहंशाह घोषित कर दिया है , इतना ही नहीं महाराज वो गरीब किसानो से आधा अनाज लगान के रूप में वसूल रहा है ।”

” हम जानते है महत्मन परन्तु हमने आक्रमण किया तो वो दोनों कुलुषी चाचा भतीजे पीछे छुप जायेंगे और कठावगढ़ क्षेत्र के लोगो को युद्ध में झोक देंगे जैसा उन लोगो ने पिछली बार किया था और हम निर्दोष प्रजा क संहार नहीं करना चाहते । ”

” परन्तु महाराज हमारे काठवगढ़ की जनता डरकर उन आंतकी चाचा भतीजे का शासन झेल रही है और वो दोनों प्रजा का शोषण कर रहे है ।”

” हम इसी बात से चिन्तित है मंत्रीवर और इसी विषय पर मंत्रणा करने के लिए आपको यहाँ आमंत्रित किया है क्योकि काथवगढ़ का मुद्दा विशाल हो गया है , हमारे शांतिप्रिय होने को हमारी कमजोरी समझा जा रहा है अगर हमने जल्दी ही कोई प्रभावी कदम नहीं लिया तो पडोसी हमें कमज़ोर समझ कर आक्रमण न कर दे । ”

” मेरे विचार से हम काथवगढ़ पर आक्रमण नहीं कर सकते है परन्तु एक उपाय है मन्त्रिवर । ” राजा की आँखों में चमक आ गई ।

” क्या ? ”

” कूटनीति ”

” मैं समझा नहीं राजन ! ” मंत्री अमर्त्यसेन उलझ कर रह गए ।  जिस तरह उन लोगो ने हमारे नियुक्त किये हुए शासक राजा जय सिंह को पदच्युक्त किया , मै चाहता हु हम भी एक ऐसा खेल खेले कि उन चाचा भतीजे की एक दिन नींद खुले तो वो दोनों कारागार मे हों । ”

“आप क्या कहना चाहते है राजन ? ये कैसे संभव है ? ”

“संभव है मन्त्रिवर , इसके लिए हम वीर को एक गुप्त अभियान के अंतर्गत काठवगढ़ भेजना चाहते है । ”

” परन्तु एक अकेला वीर क्या कर पायेगा महाराज ? ”

” दो चाचा भतीजा मिलकर इतने बुरे कार्य के लिए इतना बढ़ा खेल खेल चुके है तो हमारा वीर इस कार्य को आसानी से कर पायेगा ” ।

” उन चाचा भतीजे ने पांच वर्ष तक राजा जयसिंह का विश्वास जीता फिर उनके साथ धोखा कर खुद शासन हथिया लिया और जब हमने आक्रमण किया तो उन डरपोको ने आम प्रजा को युद्ध के मैदान में आगे कर दिया , ताकि हम हथियार न उठा सके ।”

” बस यही तो मैं कहना चाह रहा हु अमर्त्यसेन जी कि उन मक्कारो के साथ मैदान में युद्ध संभव नहीं , उन्हें तो उनकी मक्कारी से ही हराया जा सकता है । ”

” आपका सोचना उचित है महाराज पर अकेला वीर वहा जाकर यह करेंगा इसमे कितना समय लगेगा ‘ क्या तब तक काठवगढ़ की जनता उनके अत्याचार सहती रहेगी ? ”

” ऐसा लगता है मन्त्रिवर आपने आपके पुत्र वीर को पहचाना नहीं ! ”

” या महाराज आप वीर पर कुछ ज्यादा ही भरोसा कर रहे है ? ”

” नहीं, वीर ही है वो एक व्यक्ति जो काठवगढ़ का तारणहार बन सकता है । ”

” अगर ऐसा हुआ तो ये मेरी खुशकिस्मती होगी कि मेरा बेटा देश के काम आएगा । ”

” सचमुच महामंत्री आप भाग्यशाली है कि आपको ऐसा खुशकिस्मत होने का अवसर मिला अन्यथा मुझ जैसा बदकिस्मत तो सपने में भी पुत्र को लेकर ऐसी कल्पना नहीं कर सकता है , प्रद्युमन का सुधरना तो जैसे मुझे ना मुमकिन ही लगता है । ” उदास राजा का स्वर भर्रा गया ।

” ऐसा न कहिये राजन , राजकुमार में कोई कमी तो नहीं है , बस कुछ आदतो की ही तो बात है और फिर आदते तो सुधारी जा सकती है । ” मंत्री अमर्त्यसेन राजा को ढांढस बंधाते हुए बोले कुछ रुक कर फिर अपनी बात जारी रखी ” महाराज क्यों न हम राजकुमार को वीर के साथ इस अभियान पर भेज दे , घर से बाहर जाकर कुछ जिम्मेदारी आएगी तो राजकुमार को अपने आप सुधरना पड़ेगा ।”

” आपका प्रस्ताव तो बहुत अच्छा है , परन्तु उस नशेड़ी को इस अभियान से जोड़कर हम वीर और इस अभियान को संन्कट में नहीं डालना चाहते ।”

” ऐसा नहीं है महाराज , वीर और प्रद्युमन तो बचपन के मित्र है उनमे आपसी समझ है जो इस अभियान को सफलता की तरफ ले जाएगी और इस बारे में आप वीर से भी सलाह लीजियेगा । ”

” ओह मन्त्रिवर हम आपसे क्षमा चाहते है कि हमने आपको बिना बताये वीर को बुलावा भेज दिया ”

” अरे इसमें क्षमा की क्या बात है महाराज , ये तो आपने बहुत अच्छा किया , वीर पिछले एक महीने से अपने ननिहाल में था , उसकी माँ और मैं , दोनों ही उसे बहुत याद कर रहे है । ”

” सम्भवतः वीर आज साँझ तक सुजानगढ़ पहुँच जाये । ” दोनों का वार्तालाप जारी ही था कि तभी एक सेवक ने आकर उसमे व्यवधान उत्पन किय
ा ।

 

– Dinesh Charan

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