उसकी यादो का मोल

उसकी यादो का मोल

समन्दर ना भर पाया अश्को को अपने अंदर में,
जब कल हम उसकी यादो का पिटारा फिर से खोल बैठे
ना बिका मेरा दर्द सरेआम उस बाजार में “मगरिब”,
जहा हम उसकी यादो का मोल कर बैठे
वो खुद आये और हमसे पुछा क्यों, कितने की हैं ये याद,
तुम्हारी ही हैं आओ ले जाओ,हम बोल बैठे।

श्रेयस अपूर्व “मगरिब”
भोपाल

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