एक तुम ही तो (हास्य-व्यंग)

एक तुम ही तो (हास्य-व्यंग)

नाराज़ पत्नी बोली आजकल नजरें भी नहीं मिलाते

खोये-खोये रहते अब आँखों से कभी नहीं पिलाते

हूँ मैं तुम्हारी चाहत क्या तुम्हें इतना भी नहीं ज्ञान

जाने क्या हुआ तुम्हें मेरा ज़रा भी नहीं रखते ध्यान

पति ने व्यंग किया तुम मेरे साँसों की मधुशाला हो

मैंने बर्बाद होना सीखा जहाँ तुम वह पाठशाला हो

जानू, केवल तुम ही मेरे दिल को मना सकती हो

एक तुम ही तो जो मेरे घर को स्वर्ग बना सकती हो

पत्नी लजा कर बोली, सचमुच डार्लिंग, मगर कैसे

तुम भी बड़े वह हो जी, तड़पती राधा के श्याम जैसे

तुम देवलोक की अप्सरा कहा पति ने पास आकर

मेरे इस घर को स्वर्ग बना सकती हो मायके जाकर

 

 (किशन नेगी एकान्त‘ )

 

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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