ऐसा दर्द न देना मुझको

ऐसा दर्द न देना मुझको 

मैं आँसू बनकर घुल मिट जाऊँ

इतना भी निर्धन मत करना

मैं धूल कणों में जा छिप जाऊँ।

इतनी पीड़ा मत पनपाना

मैं काँटों का पलना बन जाऊँ

फूलों का गर स्पर्श मिले तो

आहत हो मैं पतझर बन जाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

मैं शाप दर्द का बन पछताऊँ।

भूखी इतनी रात न देना

मैं करवट करवट चीख न पाऊँ

और सुबह की प्रथम किरण में

अपनी आँखों कुछ देख न पाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

मैं बिन मुस्काये ही मर जाऊँ।

इतना नाजुक भी मत करना

मैं दरक-दीप सा फेंका जाऊँ

या प्रकाश पाने क्षणभर का

मैं मय बाती के जलता जाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

मैं गर्म राख में दबता जाऊँ।

इतना शापित भी न कर देना

पुण्य करूँ तो पापी कहलाऊँ

घृणित समझ दुतकारा जाऊँ।

मैं दुआ माँगने जहाँ भी जाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

संमुख तेरे मैं थरथर काँपूँ।

इतना कष्ट भी तुम मत देना

कदम कदम पर मैं गिरता जाऊँ

उठकर चलने की हिम्मत भी

नाजुक तिनकों की सी ना पाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

हर ठोकर से मैं डरता जाऊँ।

इतना भय मत उर्जित करना

मैं छुई-मुई सा ही खिल पाऊँ

आँधी की आहट पाते ही

मैं बुढ़े बरगद सा हिल जाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

मैं स्वाद खुशी का बिसरा जाऊँ।

रूप कुरूप इतना न करना

श्रंगार करूँ तो भी घबराऊँ

विषाद इतना बढ़ जावे

तिलक भाल पर लगा न पाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

इतना क्रोध करो ना मुझपर

मैं तुझे पूजना बिसरा जाऊँ

मैं भी विष पीकर बन तुझसा

मैं रौद्र रूप ले पथरा जाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

अपार प्रहार पाकर इठलाऊँ।

इतना भी छल मत करना

मैं जग में हरदम छलता जाऊँ

प्यार सभी का छलता जावे

और तिरस्कृत मैं होता जाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

मैं जीवन से ही डरता जाऊँ।

मन कलुषित इतना मत करना

मैं दुष्कर्मों में ही बँंधता जाऊँ

अधर्म की राह पड़ा मैं

मैं पतितों से भी कुचला जाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

मैं पीड़ा से समझौता कर लूँ

ऐसी पीर मत भरो प्राण में

मैं सुध बुध अपनी सब खो जाऊँ

साँसों की गिनती में उलझा

बस चिरनिद्रा में ही सो जाऊँ।

ऐसा दर्द न देना मुझको

मैं कफन ढूँढ़ता थक मिट जाऊँ।

kavita by Bhupendra Kumar Dave

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