“ऒस की बूंद “

रात ढल जाने के बाद,
आसमान की परत से,
ऎसा टुकड़ा  आया,
सोच कर अपनी किस्मत को,
छोङ घर वो बाहर आया,
चल पङा वो राह में अपनी,
साथी ना किसी को पाया,
कहां गिरुंगा,  कहां पङुंगा,
इसी सोच में बढता आया,
जलुंगा या मिलुंगा खाक् में,
या किसी के तन पर आया,
लगा सोचने अंतिम समय में,
रोक कर भी रोक ना पाया,
जॆसी आशा की थी मन में,
उससे भी अच्छा जीवन पाया,
गिरा एक पत्ते के ऊपर,
मोती रुप में मॆं मुस्काया,
आया अहम् देख साथी जनों को,
किस्मत जिनकी खाक् समाया,
ऎसा अहम् आया मुझको की,
हुई सुबह तो खाक् में पाया,
हुआ. अन्त मेरा भी अब तो,
भाग्य में जो लिखा पाया,
मॆं था वो जो कुछ पल की खुशी में
मन्द-मन्द मुस्काया …

“विराज”

About "विराज़"

“Poet”

2 Replies to ““ऒस की बूंद “”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*