कदम दो कदम इक साथ चलो तो बेहतर है

कदम दो कदम इक साथ चलो तो बेहतर है

मधुर मीठी बातें भी करो तो बेहतर है।

 

खोजने सकून चले हो अँधरी बस्ती में

चिराग जलाकर साथ रखो तो बेहतर है।

 

पहले कभी जो हौले से गुदगुदाती थी

मुस्कराहट वही बिखराओ तो बेहतर है।

 

प्यास बुझाना अब पनघट के बस में नहीं है

कुछ अश्कों को थिरकने दो तो बेहतर है।

 

कहानी अधूरी है कविता पूरी नहीं होती

ढाई अक्षर प्रेम के गुनगुनाओ तो बेहतर है।

 

स्तब्ध मौन की सी ये थमती हुई साँसें हैं

कुछ धड़कनों के साथ भी लो तो बेहतर है।

…भूपेन्द्र कुमार दवे

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