कभी कभी कागज कहता है ।

कभी कभी कागज कहता है ,
कभी लेखनी खुद कहती है
आज तुम्हें कुछ लिखना हैं ।
नही आ रहा तो सिखना है ।
कभी कभी मेरा मन कहता है,
कभी कभी चिंतन कहता है ।
आज कही कुछ सृजना है,
मन की बातें लिखना हैं ।
कभी कभी तरुवर कहता है
कभी उपवन खुद कहता है ।
आज तुम्हें कुछ लिखना है,
नहीं आ रहा तो सिखना है ।
कभी कभी मसि कहती हैं
कभी तो अक्षर ही कहता
आज तुम्हें कुछ लिखना हैं
नहीं आ रहा तो सिखना है ।
कभी कभी पंक्तियाँ कहती हैं
कभी प्रकृति स्वयं कहती
कुछ अनुभूति समझना है
आज तुम्हें कुछ लिखना है,
नहीं आ रहा तो सिखना है ।

विन्ध्यप्रकाश मिश्र विप्र

About Vindhya Prakash

विन्ध्य प्रकाश मिश्र विप्र

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