कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़

कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़,
गुरबत के दिनों की कुछ पुरानी यादें फिर ताज़ा हो जाती हैं I

इंसानी फितरत मापने का अच्छा पैमाना है ये मुफ़लिसी भी,
अपनों के बे-रब्त हुए त-अल्लुकों का आईना दिखा जाती है I

वो गुरबत का मंज़र भी देखा है तमाम घरों में अक्सर मैने,
जब माँ बच्चों को खिला खुद बचा-खुचा खाकर सो जाती है I

बेटी के ब्याह की फ़िक्र ने बाप को असमय बूढ़ा सा कर दिया,
अज़ीब रिवाज़ है बिन दहेज़ बेटी घर से विदा नहीं हो पाती है I

शहर में अमीरी की तश्वीर रेशमी कपड़ों में भी नंगी नज़र आई,
यहाँ गरीबी फटे-पुराने कपड़ों में भी बड़े शान से जिये जाती है I

कुछ देने के वास्ते किसी को दौलत-शोहरत ही हो ये ज़रूरी नहीं,
दिलेर तो फ़कीर है खाली हाथ है पर जुबां लाखों दुआएं दे जाती है I

ये मज़बूरियाँ हैं जो इंसान को तोड़ कर कमज़ोर बना देती हैं ,
अज़ीज़ों को छोंड़ गाँव,गलियों से मुँह मोड़ने कि सज़ा देती हैं I

मज़लूमों के गले काटने वालों की हैंसियत भले कुछ भी हो,
ज़ब वक्त उकूबत मुकर्रर करता है हस्ती नहीं बचा पाती है I

कोई तवायफ़ कभी भी शौक से नहीं बेंचती है ज़िस्म अपना,
पेट और मज़बूरियाँ अक्सर हालातों से समझौता करवाती हैं I

हमें मज़बूरी के तमाशे का लुफ़्त उठाना कभी रास नहीं आता,
कोई नाचनेवाली यूँ ही खुशी से नहीं पैरों में घुंघरू बंधवाती है I

रहमत तो हम सब पर ही होती है ‘ओम’ ऊपर वाले की सदा,
बस ज़िंदगी तो वक़्त के उसूलों पे ही हमेशा सबको चलाती है I
मेरी शायरी से –

About ओम हरी त्रिवेदी

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य , मानव होना भाग्य है तो कवि होना सौभाग्य . . . नाम- ओम हरी त्रिवेदी शिक्षा - स्नातक +तकनीकी डिप्लोमा जन्म स्थान - बैसवारा लालगंज , रायबरेली (उत्तर प्रदेश) व्यवसाय - शिक्षक

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