करते हैं प्यार

करते हैं प्यार

वो कह के गए हैं अब हमें याद ना करना कभी,
कैसे बताये की यादो में ही तो गुजारा करते हैं।
जो शिकवे बनाये थे हमने अपने हमदम से,
कैसे बताये की सपनो में ही तो सुधारा करते हैं।
वो बसा के जो गए थे अपना गुल सा चेहरा,
कैसे बताये की उसे ही तो निहारा करते हैं।
यूं तो बहुत से सूखे से गुजरा है ये दिल,
कैसे बताये की उसमे ही तो बहारा करते हैं।
वो तो गए थे हमको “मगरिब”, तनहा बेसहारा करके,
कैसे बताये की अब दूसरो को ही तो सहारा करते हैं।

श्रेयस अपूर्व
भोपाल

2 Replies to “करते हैं प्यार”

  1. याद जब भी आई इस तन्हा जीवन में ‘विराज’,
    ये सच है उस वक्त तुम्हें ही पुकारा करते है ॥

    सर जी आप बहुत खूब लिखते हो ॥
    पढ़ कर मजा आ गया ।

  2. बहुत बहुत धन्यवाद “विराज जी”।
    सब आप लोगो की नेमत है भाई।

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