कल मैं रहूँ ना रहूँ

(यह कविता शिक्षक दिवस की पावन बेला पर एक शिक्षक, जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है, की ओर से अपने मासूम शिष्यों को समर्पित)

कल मैं रहूँ ना रहूँ
मगर रहेंगी वो मधुर यादें,
वो सुनहरे पल
जो बिताये थे मैंने संग तुम्हारे

चाँद सितारों से भी आगे
तुमको अभी और जाना है
लक्ष्य छुपा हो कहीं भी तुम्हारा
हर हाल में उसे पाना है
रुकना नहीं, भटकना नहीं
तुम यूँ हीं निरंतर पग धरते रहना

कल मैं रहूँ ना रहूँ

फिसलती है जैसे रेत मुट्ठी से
वक्त को ना कभी फिसलने देना
ख्वाबों को अपने रखना संजोकर
इन्हें ना किसी को कुचलने देना
ख्वाब जो दिखाए मैंने तुमको
तुम यूँ ही उन्हें दुलारते रहना

कल मैं रहूँ ना रहूँ

सुर भी तुम, ताल भी तुम,
सरगम बन चहकते रहना,
मुहब्बत की खुशबु बनकर
सारे जहाँ में महकते रहना
संगीत के सप्तसुरों को अपनी धुन में
तुम यूँ ही गुनगुनाते रहना

कल मैं रहूँ ना रहूँ

गुरु-शिष्य के पावन रिश्तों को
भूलकर भी न कभी टूटने देना
बनकर पुष्प ऐसे खिलखिलाना
काँटों को न कभी रूठने देना
परम्परा के इस रेशम डोर को
तुम यूँ ही सदा थामे रखना

कल मैं रहूँ ना रहूँ

                                                                                मेघ गरजें, चमके बिजलियाँ
                                                                               या मचले आंधी और तूफान
हौसलों के स्वर्णिम पंख लगाकर
मुट्ठी में कर लेना आसमान
गिरना नहीं, लड़खड़ाना नहीं
तुम यूँ हीं उड़ान भरते रहना

कल मैं रहूँ ना रहूँ

 

कहता हूँ मैं अब अलविदा
कल फिर ना मुझे पाओगे
अपनी नटखट शैतानियों से
अब किसे तुम सताओगे
मेरी यादों को दिल में सजाकर
तुम यूँ हीं सदा मुस्कुराते रहना

कल मैं रहूँ ना रहूँ
मगर रहेंगी वो मधुर यादें,
वो सुनहरे पल
जो बिताये थे मैंने संग तुम्हारे

(किशन नेगी ‘एकांत’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

2 Replies to “कल मैं रहूँ ना रहूँ”

    • Promodini ji, is marmik kavita ko padhne va pasand karne ke liya tahe dil se shukriya. Aap jaise prshansak hi ek kavi ko aur achha likhne ke liye prerit karte hain. ek baar fir se dhanyavad.

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