कवि (आम इन्सान)

मैं जहाँ भी रहा,
बस कवि ही रहा,

लोग चलते रहे,
यूं बदलते रहे,
अपनी जरूरतों के लिए,
मुझको छलते रहे,
अपने साथ चलने को,
मुझे सबने था कहा,
मैं थमा ही रहा,
मैं जम़ा ही रहा,

मैं जहाँ भी रहा,
बस कवि ही रहा….

मुश्कलों में पङा,
डगमगाता रहा,
झल्लाता रहा,
चिल्लाता रहा,
मेरी मजबूरी को,
ना कोई सुन सका,
इस राह में मुझे,
जो भी मिला,
मुझे लूटता रहा,
बस ठगता रहा,
मेरी कमजोरी पर,
हर कोई हंसता रहा,

मैं जहाँ भी रहा,
बस कवि ही रहा….

‘विराज’

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