कहाँ थे, और कहाँ हैं हम

कहाँ थे, और कहाँ हैं हम

कहाँ थे, कहाँ हैं, और
कल कहाँ होंगे हम
साथ लेकर चले थे जो
कहाँ भटक गए वो कदम
हिमालय के चुम्बन को चले थे
कहाँ अदृश्य गए वो करम
अपने ही पगों के भूले निशाँ
न लज़्ज़ा, न आती हमको शर्म
कर्म-पथ पर अग्रसर हैं
क्यों सींचते हैं ऐसे भ्रम
बयार शीतल आई पूरब से
मगर अहसास क्यों इसके गरम
धरम का ज्ञान देने चले थे
मगर क्यों भूले अपना ही धरम
जो कदम उठे थे जोश में
अचानक क्यों पड़ गए हैं नरम
जख्मों से बहता रुधिर हमारे
लगाएगा कौन इन पर मरहम
कहाँ थे, कहाँ हैं, और
कल कहाँ होंग हम

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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