काँच के कुछ टुकड़े मेरे दामन में बाकी रह गए

काँच के कुछ टुकड़े मेरे दामन में बाकी रह गए।
तोड़ दिए थे जिन्हें अपनी सुरत देख के।
कसूर उसका नहीं था वो तो अपने वजूद को बयां कर रहा था
कसूर अपना ही था जो खुद को उनके वजूद में देख नहीं पाये।
इस दुनिया के सितम सहते सहते हम खुद ही जालिम बन गए।
खूद को देखने का वक्त आया तो हम तन्हा ही इस दुनिया में रह गए।
निकल कर आये थे जिस महफिल से हम।
उस महफिल का रास्ता आज भूल गए।
छिन ले आज कोई ये शोहरत मुझसे
बस लोटा दे मेरे बचपन के कुछ पल मुझे।
काँच के कुछ टुकड़े मेरे दामन में बाकी रह गए।

-Ramakant Umar

About Ramakant Umar

I'm an Accountant in a private company and I like to write.

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