कान्हा रस

कहत अटारी से ये बरसाने की सखिया,
कान्हा हमपे तेरा कुछ तो उधारी है।
जानत ना हैं हम अपने दिल की ये बतिया,
पर हम तुझपे ही तो वारी हैं।
बहुत सताया है तूने जलन के विछोह में,
तब ही तो हम तुझपे हारी हैं।
थक सी गयी हैं ये राह देखत देखत,
ना खुलत अब ये अखिया हमारी हैं।
जाओ ना ओ कान्हा विनती करत हैं,
देखन को हमपे कुछ तो विचारी हैं।
मानत हैं तुम हो सखा सब हीं के,
हम तो तेरे बिन जैसे बिचारी हैं।
लौटत को देखन आ जइयो ऐ कान्हा,
बार बार हम तुमको पुकारी हैं।
प्रेम रस ज्यो मिले जो कान्हा रस हो, हां,
तो कहे देती हैं की हम व्याभिचारी हैं।

श्रेयस अपूर्व
भोपाल

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