“काश इस मोहब्बत से अंजान होते”

काश हम इस मोहब्बत से अंजान होते,

ना बिछड़ने का ग़म होता,

ना मिलने के अरमान होते..

 

दूर होने के ख़याल से ही,

आँखे नम  सी हो जाती है,

जिंदगी जिस पर अभिमान है,

उसे जीने की अभिलाषा,

कम सी हो जाती है..

 

मेरे आँखो को चूमकर,

कहते हो “रख लो सम्हालकर”

ये प्यार है मेरा,

न ये आंसू बने,

ना बहे  यह  कभी,

क्या करू मै सिवा बैठ

रोने के अब,

आँख भी साथ मेरी

नही देती अब..

 

जलाओगे  जब तुम खतों को मेरे,

देखना लफ्ज कितने बिखरके मेरे

तेरे  पैरो से आकर लिपट जायेंगी..

फूल जब तुम किताबों से

बाहर करोगे,देने वाले की

याद तो ज़रूर आयेगी..

 

हम साथ हो तो,

हम दुनिया से और

दुनिया हमसे जुदा होता है,

तेरी सांसो मे जिंदगी मेरी,

सीने मे जहां और

होंठो पे खुदा होता है..

याद करते हुए तुम्हे एक दिन

आँखे रुख जायेंगे,

प्यार था जो सारा

एक दिन सुख जायेंगे,

और अपनी कहानी

के सुखद अंत से,

हम चूक जायेंगे…

 

 

क्योंकि रास्ते अलग हैं,

तो शायद!

मंजिल भी अलग होगी..

वहां तुम रहोगी,

वहां मै भी रहूंगा,

पर हम  ना रहेंगे,

हमारा वजूद ना रहेगा..

 

 

अब तो बस यही लगता है,

काश हम मोहब्बत से

अनजान होते,

ना ग़म होता बिछड़ने का,

ना मिलने के अरमान होते….

 

 

 

One Reply to ““काश इस मोहब्बत से अंजान होते””

  1. Yaad karte rahe yaad aate rahe

    Wo bhul jaaye ya mil jaaye

    Hum hamesa unki khushio ke geet gungunate rahe

    Hamari tanhayi pe mausam bhi badal gaya

    Hum ro rahe hai aap ko yaad kar karke

    Ye mausam unko bin barsat ke barish karke kah gaya..

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