कुछ ना कुछ तो लिखूँगा

कभी मै सोंचता हूँ कि नया लिख दूँ कोई एक राष्ट्रगान
उनके लिये नही जो देकर चले गये है प्राणदान
उनके लिये जो मातृभुमि की रक्षा करने से डरते हैं
घुस जाते है जो चुल्हे मे और जोरू के लिये मरते हैं

कभी मै सोंचता हूँ कि नई लिख दूँ कोई ऐसी कहानी
कि जिसको सुनकर फिर से खौल उठे वह ख़ून जो लगता है पानी
कि जिसको सुनकर हर कोई चीख पड़े बन गर्मजोशी चिल्लाए
इतनी जोर से कि दुश्मनों के कान तक फट जाए

कभी मै सोचता हूँ कि नया लिख दूँ कोई एक ऐसा गाना
कि जिसको सुनकर बच्चा बच्चा बन जाए देश का दीवाना
दीवाना इस कदर कि वह ख़ुद का भी नाम पता भुला दे
दीवाना इस कदर कि दुश्मनों की खोपड़ियाँ उड़ा दे

कभी मै सोंचता हूँ कि नया लिख दूँ कोई एक उपन्यास
पर न तो मे रवीन्द्रनाथ हूँ न तुलसी न वेदव्यास
मै ठहरा एक तुच्छ कवि पर कुछ ना कुछ तो लिखूँगा
सिखा नहीं पाया तो क्या लिख-लिखकर ख़ुद ही सिखूँगा

©सत्येन्द्र गोविन्द

:-8051804177

About Satyendra Govind

I always try to write the voice of my heart.