कुछ ना कुछ तो लिखूँगा

कभी मै सोंचता हूँ कि नया लिख दूँ कोई एक राष्ट्रगान
उनके लिये नही जो देकर चले गये है प्राणदान
उनके लिये जो मातृभुमि की रक्षा करने से डरते है
घूस जाते है जो चुल्हे मे और जोरु के लिये मरते है

कभी मै सोंचता हूँ कि नई लिख दूँ कोई ऐसी कहानी
कि जिसको सुनकर फिर से खौल उठे वह ख़ून जो बन चुका है पानी
कि जिसको सुनकर हर कोई चीख पड़े बन गर्मजोशी चिल्लाए
ईतनी जोर से कि दुश्मनों के कान तक फट जाए

कभी मै सोंचता हूँ कि नया लिख दूँ कोई एक ऐसा गाना
कि जिसको सुनकर बच्चा बच्चा बन जाए देश का दिवाना
दिवाना इस कदर किवह खुद का भी नाम पता भुला दे
दिवाना इस कदर कि दुश्मनों की मुंडिया उड़ा दे

कभी मै सोंचता हूँ कि नया लिख दूँ कोई एक उपन्यास
पर न तो मे रवीन्द्रनाथ हूँ न तुलसी न वेदव्यास
मै ठहरा एक तुक्ष्य कवि पर कुछ ना कुछ तो लिखूँगा
सिखा नही पाया तो क्या लिख लिख कर खुद हीं ँ

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About Satyendra Govind

I always try to write the voice of my heart.

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