कुछ बात तो है तेरी हर बात में।

सहमा-सहमा ये नीला आसमां,
सिसकती है क्यों ये मासूम जमीं।
घिर आती है जब श्यामल घटा,
उतरती है क्यों तेरी आँखों में नमीं।

देख मासूमियत तेरे चेहरे की,
हिमालय भी हुआ जाता घायल।
बहकती है जब मादक पुरवाई,
झनकती क्यों नहीं तेरी पायल।

सावन की मधुशाला से झरता जब,
नाजुक यौवन बन कर बूँद-बूँद।
मदहोशी में बेक़रार कुदरत भी,
करती रसपान आंखें मूँद-मूँद।

ठिठुरता है बावला सन्नाटा भी,
थिरकती जब तू चांदनी रात में।
गति थम जाती है चाँद-सूरज की,
कुछ बात तो है तेरी हर बात में।

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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