कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ

कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ

कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ?
मिल जाते हैं बच्चे उनको कैसे दूर करूँ?

लाठी लेके चलता हूँ तो
उनको बंदर-सा लगता हूँ
वो ‘हू हू’ कर मुझे चिढ़ाते
मैं मुस्काये खिसयाता हूँ
बालपन की मस्ती भी क्यूँकर दूर करूँ?
कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ?

पान चबाने ओठ चलाऊँ
तो हिप्पो जैसा लगता हूँ
बच्चे तब ‘खीं खीं’ कर हँसते
मैं लाठी ठक ठक करता हूँ
तब मैं उनको दूर हटाने क्यूँकर क्रूर बनूँ?
कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ?

मुझे चिढ़ाने मुँह बिचकाते
वो मेरा पीछा करते हैं
मैं भी उनको जीभ दिखाता
थककर जब वो गिर पड़ते हैं
तब मैं चाहूँ कैसे उनकी पीड़ा दूर करूँ?
कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ?

बच्चे तो नटखट होते हैं
खुश भी वो चटपट होते हैं
पल में रोना, पल में हँसना
झगड़े भी नखरे होते हैं
उनकी खटपट अनबन से कैसे दूर रहूँ?
कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ?

चहक रही सुन्दर चिड़ियों से
ढलता सूरज यह कहता है
सुबह सरीखा खेल तुम्हारा
मनभावन मुझको लगता है
सुबह सरीखी शाम गुलाबी क्यूँकर दूर करू?
कैसे मैं अपना बचपन अपने से दूर करूँ?
—- ——- —- भूपेंद्र कुमार दवे
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