कोई नाराज सा है

कोई नाराज सा है मुझसे बेवजह ही,
ना जाने ऐसी कौन सी खता हुई।
जिसकी कोई माफ़ी ना लिखी है उन्होंने,
ना जाने ऐसी कौन सी सजा हुई।
दिल टूटने पर सुकून देखा था उनके माथे पे,
ना जाने ऐसी कौन सी खला हुई।
बना ली है एक कौम मेरे दुश्मनो से मिलकर,
ना जाने ऐसी कौन सी रजा हुई।
गुजर नहीं पाती माथे को छू के वो गर्म साँसे,
ना जाने ऐसी क्यूँ वो बेजां हुई।
आ तो जाती हैं पर अब जिला नहीं पाती हमें “मगरिब”,
ना जाने ऐसी कौन सी हवा हुई।

श्रेयस अपूर्व “मगरिब”
भोपाल

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