क्या अभी भी मेरी जैसी ही चाहिए (हास्य-व्यंग)

क्या अभी भी मेरी जैसी ही चाहिए (हास्य-व्यंग)

छिड़ा गृह युद्ध पति-पत्नी के दरमियान
बावली घटा छाई बिजली लगी कड़कने
घर की सुनसान दीवारें बनीं तमाशबीन
गुमसुम आँगन की सांसें लगी धड़कने

व्यंग वाणों की बौछार दोनों दिशाओं से
घर जैसे बन गया हो कुरुक्षेत्र का मैदान
पति बोला तुझ जैसी मिल जाएँगी पचास
ये सच्चाई मगर तू कहाँ समझेगी नादान

क्रोध के अग्नि वाणों को देकर विराम
पत्नी बोली हुजूर तनिक इधर तो आईये
इतने वर्षों से झेला है बालम तुमने मुझे
तो क्या अभी भी मेरी जैसी ही चाहिए
(किशन नेगी ‘एकान्त’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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