क्या करूँ! ये दिल बेईमान है

क्या करूँ! ये दिल बेईमान है

हे प्रियतमा,
झटकती हो जब तुम अपने गीले केशों को
छज्जे पर खड़े हो कर तो
दिल मेरा करता है त्ताक-झांक
तेरी अजनबी दुनिया में, और
निहारता है तेरी अनछुई यौवन की अंगड़ाई को
समझाने से समझे ना ये दिल
क्या करूँ! ये दिल बेईमान है
हे प्रेयसी,
मध्य-रात्रि को जब तुम सखियों संग
चाँद की चांदनी में तलैया किनारे
चांदनी-स्नान करती हो तो
भीगे वस्त्रों से छन् कर आती
तुम्हारी सुंदरता को देख चाँद भी शरमा कर
बादलों की ओट में छिप जाता है, और
मेरा नादान दिल भी चोरी-चोरी
कनखियों से झांककर
इस अलौकिक एवं रमणीय सुंदरता देख
रसिकमय हो कर मंद-मंद मुस्कुराता है
रोके ना रुके ये निर्दई दिल
क्या करूँ! ये दिल बेईमान है
हे प्रिये,
दर्पण के सामने करती हो जब तुम
एकांत में सोलह श्रृंगार अपनी दिव्य काया का
तो अँखियों के झरोखे से
टुकुर-टुकुर निहारता है मेरा रसिक दिल
तुम्हारे स्वर्गिक आकर्षण को, और
खो जाता है बेसुध होकर
तुम्हारे वात्सल्य की गहराइयों में
टोके ना सम्भले ये छलिया दिल
क्या करूँ! ये दिल बेईमान है

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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