क्यूँ छोड़ चला खुद का साया

हर ख्वाहिश थी दफन हुई,
कोई सपना पलकों तक था ना आया,
जो ढला सूरज तो फिक्र नहीं,
पर…..
क्यूँ छोड़ चला खुद का साया……….

कुछ कागज़ है, कुछ स्याही है,
कुछ वक़्त की मोहलत पास ज़रा,
कुछ कहना था,
कुछ कह भी चुका….
जो छुट रहा वो लिख डाला………..

जो ढला सूरज तो फिक्र नहीं,
पर…..
क्यूँ छोड़ चला खुद का साया………

✍ मुरारी सिंह
( बेगूसराय )

About MURARI SINGH

लिखने की नेमत छीन भी ले, 'गर खुदा किसी गलियारे मे मेरी पहचान रहेगी तुझसे ज़िंदा, कहता है मुझसे दिल मेरा

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