क्यूँ दे रहीं वो मशवरा ?

मुझे मशवरा, वो दे रहीं, कि उनको भूल जाऊँ मैं
जो तेरी आँखों में भी हो नमी ,फिर कैसे मुस्कुराऊँ मैं

वो ख्वाब ही में आ मिलें, हूँ मैं अब इसी उम्मीद में
है आँखों में पर नींद कम, भला इनको कैसे सुलाऊँ मैं

जिसे कहते थे ये लब मेरे, मेरी जान तू, अरमान तू
वो बदल गया तो क्या हुआ, उसे बेवफा कैसे बुलाऊँ मैं

वो रेत पर लिखा था जो , तूने प्यार से कभी नाम मेरा
लहर जिसे मिटा गयी, उसे जेहन से कैसे मिटाऊँ मैं

मेरे दिल में इक चराग है, तेरी यादों का, तेरे वादों का
जल रहा जो दिल भी तो, भला चराग कैसे बुझाऊँ मैं

क्यूँ दे रहीं, वो मशवरा ? कि उनको भूल जाऊँ मैं !!

✍ मुरारी सिंह
( बेगूसराय )

About MURARI SINGH

लिखने की नेमत छीन भी ले, 'गर खुदा किसी गलियारे मे मेरी पहचान रहेगी तुझसे ज़िंदा, कहता है मुझसे दिल मेरा

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