क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१)

क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१)
हे मानव व्यर्थ में क्यों करता, तू गर्व अपनी ही रचना पर
तूफान में डगमगाती कश्ती तेरी, क्यों करता है अभिमान
तोड़ सारे नियम स्वयं के, क्यों कर तू इतना इतराता है
निशाचर विचरते निर्भीक, क्यों चिर-निद्रा में तेरा विधान

किन्तु व्यग्रता तेरी तक़दीर नहीं, क्योंकि तू है मनु की संतान

जकड़ लिया तेरे साम्राज्य को, तेरे ही मक्कड़ जालों ने
अपने ही प्रगति-पथ पर, तेरा अहंकार बना है व्यवधान
हिमीगिरि के उतुंग शिखर बैठ, गढ़ कोई इतिहास नया
त्याग अहंमन्यता के भाव सारे, रच कोई नया कीर्तिमान

किन्तु पथभ्रष्ट होना तेरा कर्म नहीं, क्योंकि तू है मनु की संतान

ह्रदय-गगन में धूमकेतु सी, वासना की उठती ऊँची लहरें
देवकामिनी के उन्मत नयनों से, क्यों वृथा करता सुरापान
ठहर ज़रा और कर ले तनिक विश्राम, सोच क्या तेरा कर्म
बांध सभी पापों को एक गठरी में, कर इन सबका अवसान

किन्तु हार मानना तेरा धर्म नहीं, क्योंकि तू है मनु की संतान

कहाँ लुप्त हुई वह अभिलाषा, नील गगन को छूने की इच्छा
शरणागत हों शैल शिखर के, ग्रहण करने को अद्भुत ज्ञान
अपने ही कोलाहल में खोया तू, धुंधली हो गई तेरी स्मृति
मनु वंश के भूल संस्कार, करता रहा तू अपना ही गुणगान

किन्तु पौरुष ही तेरा भाग्य है, क्योंकि तू है मनु की संतान

प्रलयमयी क्रीड़ा में रहा आशंकित, भुला अपनी सभ्यता
अवगुणों के रसातल में धंस कर, खोई अपनी ही पहचान
उद्विग्न है तेरा पापी दृदय, आगंतुक बन अपनी ही नगरी में
नित्य विचरते थे जहाँ देवदूत, धरा अब वह क्यों श्मशान

अपनी एक नई पहचान बना, क्योंकि तू है मनु की संतान

याद कर उन उत्कृष्ट क्षणों को, मनु ने जब सिंहासन सौंपा
और कहा कि सत्यमार्ग से ही, बनेगा एक दिन मनु महान
प्रजा को सदैव देवतुल्य मान कर, उनको न कभी सताना
निर्भीक होकर निर्णय लेना, वंशजों ने दिया था ये वरदान

वंशजों का विलक्षण कौशल तुझमें, क्योंकि तू है मनु की संतान
(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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