क्यों गमगीन है “बैल समुदाय” (व्यंग व हास्य)

क्यों गमगीन है “बैल समुदाय” (व्यंग व हास्य)

रिमझिम-रिमझिम बारिश की फुहार
खूब बरसी इस सावन में
हरियाली खिलखिलाती है
मेरे गांव के खेत-खलिहानों में
प्रकृति ने किया अद्भुत शृंगार
इठलाती-इतराती पुरवाई संग
पिली सरसों भी लेती अंगड़ाई
गुलाबी अहसासों के संग
पर न जाने क्यों उदास है
मेरे गांव का “बैल समुदाय”
उनके विवश आँखों से बहते आंसू और
झुर्री पड़े गालों पर
गहरी व्याकुलता की रेखाएं
बयां करती हैं उनकी लाचारी, बेबसी और
ना उम्मीदी की दास्ताँ
क्योंकि “बैल समुदाय” है भूखा
कई रातों और कई दिनों से
शायद खा गया है कोई
चारा उनके हिस्से का
चारा खाने वाला कोई और नहीं, अपितु
“बैल समुदाय” के गांव का ही
कोई सिरफिरा नेता है
न जाने कितने और
गबन, घोटाले एवं खयानत जन्म लेंगे
शायद इसीलिए चिंतातुर है
आज भी गांव का “बैल समुदाय”

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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