क्यों डरना रात के अंधकार से

क्यों डरना रात के अंधकार से

रात के ख़ौफ़नाक अन्धकार से
क्यों भागते हैं हम
क्यों डरते हैं हम
क्यों कतराते हैं हम
धरते क्यों नहीं पग अपने
हम रात के अँधेरे में जबकि
झरती हैं जीवन की कई धाराएँ
इसी अँधेरी रात के निर्मल झरनों से
जो छूती हैं दहलीज़ हमारी मंज़िल की
जो स्पर्श करती हैं हमारे मार्ग की माटी को
जो जगाती हैं हमारे सोये हुए अहसासों को और
दिखाती हैं हमें हमारे मंज़िल की खिड़की
रात का अपरिचित सन्नाटा
इतना अशुभ नहीं होता
इतना निष्ठुर नहीं होता
इतना क्रूर नहीं होता
तो फिर क्यों सहमते हैं इस सन्नाटे से
शायद नहीं जानते हम कि
सूरज की अरुणिमा भी
गुजरी होगी कभी इसी अँधेरी रात से और
खिली होगी उषा की पहली किरण
काश इस घने अंधेरे मैं हम भी
रौशनी कर पाते जलाकर एक दीप
अपनी उम्मीदों का
अपने सपनों का
अपनी कल्पनाओं का क्योंकि
बहुधा हर सफलता का द्वारं
खुलता है एक धुँधली पगडंडी से
चलो जलाऐं एक अलौकिक एवं विलक्षण
दीप उज्जालों का

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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