क्यों?

क्यों?

तेरे धुंधली स्वप्नों की विस्मृति में,
मन का उन्माद निखरता क्यों?
सुरभित लहरों की उमंगों में,
सागर का वैभव बिखरता क्यों?
रुपहली रातों की शीतल छाया में,
तारों की तरूणाई बहकती क्यों?
माना मेरा भाग्य गगन धुंधला-सा,
पर तुम उस पर थिरकती क्यों?
किरणें बन तू दे उज्ज्वल आभा,
नटखट दिनकर दमकता क्यों?
मैं नित्य अतृप्त प्रेम भिखारी तेरा,
त्रिषित दिल फिर तड़पता क्यों?
कोमल ह्रदय के उष्ण अंचल में,
आत्मोत्सर्ग की अतृप्ति क्यों?
गोधूलि के धूमिल रजत पट पर,
चांदनी रात की दिव्य दीप्ति क्यों?
मेरी तीव्र पीड़ा पर छिड़केगी तू,
कुसुम-धूलि मकरंद घोल क्यों?
असह्य विरह की व्याकुलता में
भरे जख्म में फिर हरे खोल क्यों?
तेरे धुंधली स्वप्नों की विस्मृति में,
मन का उन्माद निखरता क्यों?

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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