ख़त

होती है तबीयत जब कभी
वह जो ख़त तुमने लिखे थे
प्यार की आंखों से
अनकही बातों को भी
सुनता रहा तेज सांसों से
बिन बरसे उड़ गये जो बादल
बिन ढले सम्भल गया जो आंचल
गुजरे हुए वक्त के साये में
कुछ यादों के दीप जलाये
सोचता हूं शायद ख़त आये
फिर खोलकर बैठ जाता हूँ
ख़त वह सब पुराने
और अब जब कि
तुम्हे बताने के लिये
मेरे दिल में कई अरमान
देखता हूं कि तुम्हारे पास
मेरे लिए बाक़ी नहीं एहसास
मगर एक धुंधली सी
रोशनी आशा की
तुम्हारे वह सारे पैगाम
मेरे जीने के हैं मुकाम
सजन

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