खेल का मैदान

खेल का मैदान

रचा जा रहा षड्यंत्र

मासूम बच्चों के खिलाफ़

कच्चे घड़ों को

बंदूक की शक्ल में

ढाला जा रहा हैं

खिलौनों में भरे हैं

विस्फोटक पदार्थ

सिरफिरे कर रहे ऐलान

माँ की लोरियाँ

गाई न जाए

सुनो, धमाके का शोर

घर-बाहर ,हर ओर

सुरक्षित  नहीं बचपन

किन्तु ,बच्चे मानते कहाँ

होते हैं बड़े शरारती

किसी भी हालात में

चुप नहीं बैठ सकते

घरों में दुबकने को

कतई नहीं तैयार

किसी न किसी दिन

ढूढ़ ही लेंगे

खेल का मैदान

जहां –

लहू के कतरे नहीं

मजहब की पाबंदियाँ नहीं

नस्ल का भेदभाव नहीं

बस केवल गूंजेगी

खिलखिलाने की आव़ाज ——-

 

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About पूनम सिन्हा

M.Sc. Zoology

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