ख्वाब का एक टुकड़ा

ख्वाब एक देखा मैंने
बनकर जब एक ख्वाब
मेरे ख्वाबों में आई तुम
चुराकर गुलाबी निंदिया मोरी
उड़ चली ख्वाबों के नीले आसमां में
दफनाकर अधूरे ख्वाबों को
संवेदन-शून्य निंदिया के सिरहाने
मैं भी उड़ चला करके अनुसरण
तेरी धुंधली परछाई का
देखा मैंने कि तुम थी सवार
ख्वाबों के चांदनी रथ पर
सजाकर सुनहले पंख अपनी बाहों में और
उड़ रही थी उन्मुक्त गगन में
संग तेरे खवाबों की बारात थी
कुछ ख्वाब गुलाबी, कुछ नीले
कुछ असमानी, कुछ बैंगनी
अचानक टुकड़ा एक ख्वाब का
गिरा जमीं पर टकराकर मुझसे और
खुल गई मेरी व्याकुल आंखें
टूट गई थी निंदिया मेरी
टुकड़ा ख्वाब का जो पड़ा था जमीन पर
वो कोई और नहीं, अपितु
मेरे ही अधूरे ख्वाब का
एक मासूम टुकड़ा था

(किशन नेगी ‘एकांत’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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