ख्वाहिश

अनकहे, अनसुलझे
जज्बातों से
मन मचलता है
जैसे रोता बच्चा
खिलौना पाने
चाहे सम्भाल पाये
या नहीं ढंग से
उमंग हैं अपनी
जाने कैसे
अनजानी पहचान से
जैसे होते सपने,
जब तक उम्मीद
दिल में
खूब ललचाता है
जज्बातों के खेल में
मन गिरगिट सा
रंग बदलता है
जैसे रोता बच्चा
पाने को हर चीज
नासमझे कोई बंधन
बेफिक्र दिल से
रोता न मिलने पर
मिलने पर
खुब खेलता
कुछ वक्त
और फिर तोड़कर
न समझ सका
देख देख कर
पर जोड़ने की
कोशिश, हारकर
झट पट
बहुत पलटता है
खेल खेल में
नये जज्बातों से
मन गिरगिट सा
रंग बदलता है !
जैसे खेल में बच्चा
मचलता है !
मनमाफिक
ख्वाहिश पर
और तब
दर्द पिघलता
जज्बातों में
नये खिलौनों पर
सजन

Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*