ग़ज़ल

रिश्तों के टूटे हुए धागों को, जोड़ने की कोई बात करें,
दर्पण के बिखरे टुकड़ों को ,जोड़ने की कोई बात करें |

जिन जंजीरों में होकर क़ैद, तड़पे थे दो दिल कभी,
उन जंग लगी जंजीरों को, तोड़ने की कोई बात करें |

सागर की तूफानी लहरों ने, डुबाई थी कश्ती हमारी,
आज उन लहरों के रुख को, मोड़ने की कोई बात करें |

माँ के जिस आँचल का साया, रहा सदा सर पर हमारे,
आओ उस पवित्र आँचल को, ओढ़ने की कोई बात करें |

भीड़ में जिन यारों ने, छोड़ा था साथ हमारा ‘एकांत’,
ऐसे मतलबी भेड़ियों को, छोड़ने की कोई बात करें |

(किशन नेगी ‘एकांत’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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