गीत समर्पित तुझको करने

गीत समर्पित तुझको करने

गीत समर्पित तुझको करने

कुछ चाहत मन में आती है।

तेरे  ही  संगीत  धुनों  में

लय  बँधती गुँथती जाती है।

 

है  शाश्वत  संगीत तुम्हारा

इनसे हम क्या ताल मिलायें

मेरे गीतों  की  नश्वर लय

क्षणभंगुरता   ही   दर्शायें

 

मेरे  साँसों की  लहरें  तो

लघुता  अपनी  दर्शाती  हैं।

गीत समर्पित  तुझको करने

कुछ चाहत मन में आती है।

 

तेरा  तो  है  संगीत  अमर

प्रतिध्वनि-सा अनंत समय का

सृष्टि सृजन के भी पहले का

शब्दनाद-सा विकट प्रलय का

 

मेरे मन की उठती लहरें तो

लघुमंथन की  बस होती  हैं

गीत समर्पित तुझको करने

कुछ चाहत मन में आती है।

 

सब कुछ है वैसे तो सीमित

सप्तसुरों  की ही  माया में

पर  है  तेरा  रूप उभरता

नित नवीन-सा हर माला में

 

किसको चुन लूँ, किसको तज दूँ

यह बात  समझ  ना  आती है।

गीत   समर्पित  तुझको  करने

कुछ  चाहत मन में  आती  है।

 

अस्ताचल की स्तब्ध पलक में

दिखता है अरुणोदय कल का

पर  दिखता  अपने गीतों में

जीवन अस्ताचल हर पल का

 

जीने के दो पल देकर ही

जब मौत विकल हो जाती है

गीत  समर्पित  तुझको  करने

कुछ चाहत  मन में  आती है।

 

पर कहते हैं साज साँस के

गीतों की धुन में बजते हैं

कवि की कोमल वाणी से ही

हर शब्द गीत में सजते हैं

 

जब सरगम के काँधों पे ही

सुर की डोली सज जाती है

गीत समर्चित तुझको करने

कुछ चाहत मन में आती है।

                           … भूपेन्द्र कुमार दवे

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